6. करोड़ों की आबादी को नकारने का प्रयास - Page 141

126 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हो सकता है कि बाहर वाला कोई व्यक्ति इन कसौटियों की महत्ता और प्रभाव को न समझ पाए। वह पूछ सकते हैं कि इस सबका अस्पृश्यता से क्या लेना-देना है। लेकिन अस्पृश्यों की आबादी सुनिश्चित करने से संबंतिधत प्रश्न के संदर्भ में उनकी महत्ता और प्रभाव को वह समझ पाएगा। जैसा कि बताया जा चुका है, अस्पृश्यता की कोई कानूनी परिभाषा नहीं है और कोई परिभाषा हो भी नहीं सकती। अस्पृश्यता स्वयं को सिर के बाल या चमड़ी के रंग द्वारा व्यक्त नहीं कर सकती। इसका रक्त से कोई संबंध नहीं है। कतिपय प्रथाओं के पालन और व्यवहार के तरीकों में अस्पृश्यता परिलक्षित होती है। अस्पृश्य वह व्यक्ति है, जिसके साथ हिंदू एक निश्चित प्रकार का व्यवहार करते हैं और जो हिंदुओं से भिन्न कतिपय रीति-रिवाजों का पालन करता है। सामाजिक मामलों में अस्पृश्यों के साथ हिंदू निश्चित प्रकार का व्यवहार करते हैं। अस्पृश्य उन निश्चित प्रथाओं का पालन करते हैं। जब स्थिति यह है तो कौन अस्पृश्य है, इसका पता लगाने का केवल यह तरीका है कि उनके रीति-रिवाजों को कसौटी माना जाए और यह पता लगाया जाए कि कौन-सी जातियां उनका पालन करती हैं। अन्य कोई उपाय है ही नहीं। यदि बाहर वाला व्यक्ति इस बात को ध्यान में रखता है तो वह समझ पाएगा कि यद्यपि जनगणना आयुक्त द्वारा निर्धारित कसौटियां अस्पृश्यता का कोई रंग नहीं दर्शातीं, फिर भी तथ्य यह है कि वे अस्पृश्यता के प्रमाण-चिर्िं हैं। जब स्थिति यह है तो इस बारे में कोई संदेह नहीं रह सकता कि प्रक्रिया उचित थी और कसौटियां खरी थीं। अतः यह कहना सही होगा कि जहां तक इस प्रकार के मामले हो सकते हैं, इस छानबीन के नतीजे महत्वपूर्ण थे और प्राप्त आंकड़े सही थे।

III

अस्पृश्यों की कुला आबादी के बारे में 1911 के जनगणना आयुक्त के निष्कर्षों की पुष्टि 1921 के जनगणना आयुक्त ने की।

सन् 1921 के जनगणना आयुक्त ने अस्पृश्यों की आबादी को सुनिश्चित करने के लिए छानबीन भी की। इस रिपोर्ट के भाग I में जनगणना आयुक्त ने कहा हैः

हाल के वर्षों में समाज के कतिपय वर्ग को ‘दलित वर्ग’ कहने का रिवाज

सा हो गया है। जहां तक मुझे मालूम है ‘दलित वर्ग’ शब्द की कोई अंतिम

परिभाषा नहीं है, और न ही निश्चित रूप से इससे यह पता चलता है कि

कौन-कौन उसके अंतर्गत आता है। 1912/17 तक की शिक्षा संबंधी प्रगति के

बारे में पंचवर्षीय समीक्षा (अध्याय 18, पैरा 505) में शिक्षा-सहायता तथा प्रगति

की दृष्टि में दलित वर्गों पर विशेष रूप से विचार किया गया है। उस रिपोर्ट