करोड़ों की आबादी को नकारने का प्रयास
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के परिशिष्ट XIII में एक सूची दी गई है। उसमें इस समुदाय के इस वर्ग की जातियों तथा जनजातियों का उल्लेख किया गया है। इस सूची के अनुसार दलित के रूप में वर्गीकृत कुल आबादी तीन करोड़ दस लाख अथवा ब्रिटिश भारत की हिंदू जनजातीय आबादी का 29 प्रतिशत बताई गई है। इसमें संदेह नहीं कि एक सरकारी रिपोर्ट में संभवतः आपत्तिजनक लगने वाले सामाजिक विभेद को प्रकाशित करने में अप्रसन्नता का कुछ जोखिम है, लेकिन यह तथ्य है कि सूचियां प्रकाशित हो चुकी हैं और विशेषतः दक्षिण भारत में दलित वर्गों में वर्ग-चेतना और वर्ग-संगठन पैदा हो चुका है, और उनकी सेवा वे विशेष मिशन कर रहे हैं, जिन्हें परोपकारी संस्थाओं ने खड़ा किया है तथा जिन्हें अधिकृत रूप से विधान-मंडलों में प्रतिनिधित्व प्राप्त है। इस तथ्य को देखते हुए निश्चय ही यह उचित दीख पड़ता है कि तथ्यों का सामना किया जाए और उनकी संख्या के बारे में आंकड़ों का कुछ आकलन प्राप्त किया जाए। अतः मैंने प्रांतीय अधीक्षकों से कहा कि वे मेरे सामने एक आकलन प्रस्तुत करें। मैंने उनसे कहा कि आकलन में उन जातियों की कमोबेश सही संख्या के लिए जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया जाए, जिन्हें आमतौर पर दलित की श्रेणी में शामिल किया गया है।
मुझे सभी प्रांतों तथा राज्यों से किसी-न-किसी प्रकार की सूचियां प्राप्त हुईं, पर संयुक्त प्रांत इसका अपवाद रहा। वहां की सरकारी मनोदशा की छुईमुई नजाकत ने मोटा अनुमान देने की कोशिश भी गवारा नहीं की। दिए गए आंकड़े सही तथा समान कसौटियों पर आधारित नहीं हैं, क्योंकि भारत के अलग-अलग हिस्सों में एक जैसे समूहों की स्थिति के बारे में अलग दृष्टि अपनाई जाती है। अतः कुछ मामलों में मुझे आकलनों में संशोधन करना पड़ा। इसके लिए मैंने शिक्षा संबंधी रिपोर्ट के आंकड़ों और 1911 की रिपोर्ट तथा सारणियों की सूचना को आधार बनाया। वे भी इस पूर्वोक्त सामान्य त्रुटि से ग्रस्त हैं कि किसी जाति की कुल संख्या दर्ज नहीं की गई है। लेकिन विवरण इस बारे में मोटा अनुमान दे देता है कि वह कौन-सी ‘न्यूनतम’ संख्या है, जिसे हिंदू समाज का - ‘दलित वर्ग’ माना जा सकता है। इन प्रांतीय आंकड़ों का कुल जोड़ पांच करोड़ तीस लाख से लगभग बैठता है। लेकिन इसे भी एक निम्न तथा अनुदार आकलन मानना होगा। इसमें (1) संबद्ध जातियों और जनजातियों की कुल संख्या नहीं दी गई है, और (2) न ही उसमें उन आदिम जातियों के लोगों की संख्या दी गई है, जो अभी हाल में हिंदू धर्म में शामिल हुए हैं और जिनमें अनेक को अपवित्र माना जाता है। हम निश्चय के साथ कह सकते हैं कि दलित वर्गों को अपवित्र माना जाता है, उन सबकी संख्या भारत में ही साढ़े पांच और छह करोड़ के बीच होगी।
फिर साइमन कमीशन ने जांच की। इस कमीशन को 1929 में ब्रिटिश संसद ने