128 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
नियुक्त किया। उससे कहा गया कि वह 1919 के भारत सरकार के अधिनियम के अधीन लागू किए गए सुधारों के कार्य की जांच करे और अन्य सुधारों का सुझाव दें।
उस समय जब उन सुधारों पर चर्चा हो रही थी जिन्हें बाद में 1919 के अधिनियम में शामिल किया गया, मोंटेग्यू-चेम्सफोड रिपोर्ट तैयार करने वालों ने स्पष्टतः अस्पृश्यों की समस्या को स्वीकार किया। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे विधान-मंडलों में उनके प्रतिनिधित्व के लिए सर्वोत्तम व्यवस्था करेंगे। लेकिन लार्ड साउथबरो की अध्यक्षता में मताधिकार तथा मतदान प्रणाली सुझाने के लिए जो कमेटी नियुक्त की गई, उसने उनकी पूर्ण उपेक्षा की। पर भारत सरकार ने उसकी इस उपेक्षा का अनुमोदन नहीं किया और निम्न टिप्पणी कीः
वे (अस्पृश्य) कुल आबादी का पांचवां भाग हैं और उन्हें मार्ले-मिंटों कौंसिलों
में कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। कमेटी की रिपोर्ट में उनका (अस्पृश्यों के
रूप में) दो बार उल्लेख किया गया है, लेकिन केवल यह जताने के लिए कि
संतोषजनक निर्वाचन-क्षेत्र न होने की दशा में उनके लिए नाम निर्देशन की व्यवस्था
कर दी गई है। उसमें यह उल्लेख नहीं किया गया है कि इन लोगों की स्थिति
क्या है और उनमें स्वयं अपनी देखरेख करने की कितनी क्षमता है। न ही उसमें
यह बताया गया है कि उसने इन लोगों के लिए कितने नामांकन का सुझाव दिया
है... कितने प्रतिनिधित्व का प्रस्ताव किया है। उसने सुझाव दिया कि ब्रिटिश भारत
की कुल आबादी के पांचवें भाग के लिए लगभग आठ सौ सीटों में से सात सीटें
अलॉट की जाएं। यह सच है कि सभी कौंसिलों में अधिकारियों का लगभग छठा
भाग ऐसा होगा, जिनसे यह आशा की जा सकती है कि वे (अस्पृश्यों) के हितों
का ध्यान रखेंगे, पर हमारी राय में सुधारों संबंधी रिपोर्ट का यह लक्ष्य नहीं है।
रिपोर्ट तैयार करने वालों ने कहा कि (अस्पृश्यों) को भी आत्मरक्षा का पाठ पढ़ना
चाहिए। निश्चय ही, यह कैसी बेतुकी आशा है कि एक ऐसी विधायिका में जहां
साठ-सत्तर सवर्ण हिंदू हों, इस समुदाय के एक अकेले प्रतिनिधि को शामिल करके
वह नतीजा हासिल किया जा सकेगा। यदि रिपोर्ट के सिद्धांतों को सार्थक बनाना है,
तो हमें बहिष्कृतों के प्रति और अधिक उदार व्यवहार करना ही होगा।
सरकार ने सिफारिश की कि कमेटी ने अस्पृश्यों के लिए जितनी सीटें अलॉट की हैं, उनकी संख्या को दुगना कर दिया जाए। तदनुसार सात के स्थान पर उन्हें चौदह सीटें दी गईं। हम देखेंगे कि यदि व्यवहार की कसौटी पर हम भारत सरकार की उदारता को परखें, तो वह नगण्य-सी है। निश्चय ही, वह अस्पृश्यों को समुचित न्याय प्रदान नहीं करती।