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करोड़ों की आबादी को नकारने का प्रयास

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ऐसे तथ्य, हासिल करे, जिससे दलित वर्गों के लिए अलग प्रतिनिधित्व का तरीका

खोजने में सुविधा मिल सके।

तदनुसार भारतीय मताधिकार कमेटी ने जो प्रश्नावली जारी की, उसमें यह प्रश्न भी शामिल थाः ‘किन जातियों को आप दलित वर्गों में शामिल करेंगे? क्या आप अस्पृश्यों से इतर वर्गों को शामिल करेंगे, यदि हां तो किन्हें?’

मैं भारतीय मताधिकार कमेटी का सदस्य था। जब मैं इस कमेटी का सदस्य बना तो मुझे मालूम था कि जिस मुख्य प्रश्न पर मुझे सवर्ण हिंदुओं से जूझना पड़ेगा, वह था अस्पृश्यों के लिए संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र बनाम पृथक निर्वाचक-मंडल का प्रश्न। मुझे पता था कि भारतीय मताधिकार कमेटी में अस्पृश्यों के विरोध में स्पृशों का पलड़ा भारी होगा। वहां कमेटी में मैं अस्पृश्यों का अकेला प्रतिनिधि हूंगा, जब कि सवर्ण हिंदुओं के आधा दर्जन प्रतिनिधि होंगे। ऐसे विषम संघर्ष के लिए मैंने स्वयं को तैयार कर लिया था। भारतीय मताधिकार कमेटी की सदस्यता स्वीकार करने से पूर्व मैंने यह शर्त रख दी थी कि अस्पृश्यों के लिए संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र रखे जाएं या पृथक निर्वाचक-मंडल, यह प्रश्न कमेटी के विचारार्थ विषय में शामिल न किया जाए। इस शर्त को मान लिया गया और प्रश्न को भारतीय मताधिकार कमेटी के विचार के दायरे से अलग रखा गया। अतः मुझे इस बात का कोई डर नहीं था कि कमेटी में मुझे इस प्रश्न का मतदान में हरा दिया जाएगा। यह एक ऐसी रणनीति थी, जिसके लिए मुझे हिंदु सदस्यों ने क्षमा नहीं किया। लेकिन एक दूसरी ही समस्या उठ खड़ी हुई, जिसका मुझे तनिक भी आभास नहीं था। वह समस्या अस्पृश्यों की संख्या की थी, जिसकी पड़ताल 1911 और 1929 के बीच चार अलग-अलग प्राधिकारियों ने की थी। उन्होंने पाया कि अस्पृश्यों की आबादी कोई पांच करोड़ के लगभग होगी। मुझे इसका कोई आभास नहीं था कि भारतीय मताधिकार कमेटी के सामने इस प्रश्न पर कोई विवाद खड़ा हो जाएगा। भले ही विचित्र लगे, पर यह तथ्य है कि भारतीय मताधिकार कमेटी के सामने संख्या के मसले पर बड़ी कट्टरता से विवाद किया गया और उस पर लंबी खींचातानी हुई। कमेटी की अनगिनत बैठकें हुईं और अनगिनत साक्षी हाजिर हुए और उन्होंने अस्पृश्यों के अस्तित्व को नकारा। यह एक विचित्र घटना थी और मुझे उसका सामना करना पड़ा। यह तो संभव नहीं होगा कि उस प्रत्येक साक्षी के बयान का उल्लेख किया जाए, जिसने हाजिर होकर अस्पृश्य जैसे वर्ग के अस्तित्व को नकारा। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए इतना पर्याप्त होगा कि मैं अस्पृश्यों की आबादी के प्रश्न के बारे में प्रांतीय मताधिकार कमेटियों तथा उनके सदस्यों के विचारों का उल्लेख कर दूं।