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करोड़ों की आबादी को नकारने का प्रयास

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देने से कतरा गई। पंजाब प्रांत की कमेटी ने बहुमत से इंकार कर दिया कि प्रांत

में दलित अथवा अस्पृश्य जैसा कोई वर्ग है।

संयुक्त प्रांत

प्रांतीय मताधिकार कमेटी की रायः

संयुक्त प्रांत मताधिकार कमेटी की राय है कि केवल उन्हीं वर्गों को ‘दलित’

कहा जाए, जो अस्पृश्य हैं। इस कमेटी के अनुसार इन प्रांतों में अस्पृश्यता की

समस्या है ही नहीं। अपवाद केवल भंगियों, डोनों तथा धानुकों का है। उनकी

कुल संख्या स्पृश्य वर्गों सहित केवल 582,000 है। ख्1,

संयुक्त प्रंत की प्रांतीय मताधिकार कमेटी में अस्पृश्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्य बाबू रामसहय ने अपने विमत टिप्पण में कहा कि संयुक्त प्रांत में अस्पृश्यों की संख्या ख्2, 1, 14, 35, 117 है। संयुक्त प्रांत की प्रांतीय मताधिकार कमेटी में दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक और सदस्य राय साहब बाबू रामचरन ने अपने विमत टिप्पण में कहा कि संयुक्त प्रांत में दलित वर्गों की संख्या ख्3, दो करोड़ है।

संयुक्त प्रांत की सरकार ने सूचना ख्4, दी कि अधिकतम अनुमान एक करोड़ 70 लाख का है और न्यूनतम अनुमान 10 लाख से कुछ कम है। उनकी राय में संख्या 67, 73, 814 से अधिक नहीं है।

बंगाल

बंगाल प्रांत की मताधिकार कमेटी ने अपनी पहली रिपोर्ट ख्5, में कहाः

कमेटी इस प्रश्न के बारे में किसी निर्णय पर नहीं पहुंच सकी और उसने

संकल्प किया कि उसे केंद्रीय कमेटी के पास विचार के लिए वापस भेज दिया

जाए।

अपनी अंतिम रिपोर्ट में उसी कमेटी ने कहाः

निर्धारित कसौटी के अनुसार, अर्थात् अस्पृश्यता और असामीप्यता के अनुसार,

जैसा कि इन शब्दों से भारत के अन्य भागों में अभिप्रेत है, कमेटी का विचार है

कि केवल भुईमाली को छोड़कर बंगाल में ऐसा कोई अन्य वर्ग नहीं है। ख्6,

  1. आई.एफ.सी., खंड 5, पृ. 398

  2. वही, पृ. 440

  3. वही 5, पृ. 285

  4. वही, पृ. 297-98

  5. वही, पृ. 189

  6. वही, पृ. 230