134 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बंगाल प्रांत की मताधिकार कमेटी में दलित वर्गों के प्रतिनिधि श्री मल्लिक ने अपने विमत टिप्पण में अनुसूचित वर्गों की 86 जातियों की सूची प्रस्तुत की।
बिहार और उड़ीसा
बिहार और उड़ीसा में 1911 की जनगणना के अनुसार दलित वर्गां की आबादी, 93,00,000 थी और 1921 की जनगणना के अनुसार, 8,00,000 थी।
लेकिन बिहार तथा उड़ीसा की प्रांतीय मताधिकार कमेटी ने अपने प्रांतीय ज्ञापन ख्1, में कहाः
दलित वर्गों की परिभाषा के अंतर्गत आने वाली जातियों अथवा संप्रदायों की
संपूर्ण सूची देना कठिन कार्य है। केवल इन वर्गों को दलित कहा जा सकता है,
जैसे मुशहर, दुसाध, चमार, डोम और मेहतर। उनकी संख्या इतनी विशाल नहीं है
कि एक पृथक मतदाता सूची में उनके समूहन के औचित्य को सिद्ध किया जा
सके। बिहार में दलित वर्गों की समस्या बंबई अथवा दक्षिण भारत जैसी विकट
नहीं है। कमेटी का विचार है कि दलित वर्गों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व की
कोई जरूरत नहीं है।
पर इस कमेटी ने अपनी अंतिम रिपोर्ट ख्2, में कहाः
जिन वर्गों को आमतौर पर अस्पृश्य माना जाता है, वे हैं, चमार, दुसाध,
डोम, हलालखोर, हरि, मोची, मुशहर, पानपासी। .... लेकिन कमेटी के बहुमत
सदस्यों का विचार है कि दलित वर्गों के रूप में विशेष प्रतिनिधित्व दिए जाने
की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि उनकी शिकायतें बंबई या दक्षिण भारत जैसी
विकट नहीं हैं।
क्या कारण था कि हिंदुओं ने अचालक अपना रूख बदल लिया और अस्पृश्यों की करोड़ों की आबादी नकारने का प्रयास किया? पांच करोड़ की संख्या तो 1911 के रिकार्ड में मौजूद थी। किसी ने भी उस पर आपत्ति नहीं की। क्या कारण है कि इस आंकड़े की सच्चाई को चुनौती देने का कोई कारण न होने पर भी हिंदुओं ने इतने दृढ़ निश्चय से प्रयास किया।
जवाब सीधा-सा है। 1932 तक अस्पृश्यों का कोई राजनीतिक महत्व नहीं था। भले ही वे सामाजिक दृष्टि से हिंदू समाज की परिधि से बाहर थे, क्योंकि हिंदू समाज तो केवल चार वर्गों, अर्थात् ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शदू्रों, को मान्यता देता है, पर राजनीतिक प्रयोजनों के लिए उन्हें हिंदू समाज का अंग माना जाता था।
आई.एफ.सी., खंड 3, पृ. 129
वही, खंड 3, पृ. 188