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करोड़ों की आबादी को नकारने का प्रयास

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अतः राजनीतिक प्रयोजनों के लिए, जैसे विधान-मंडल आदि में प्रतिनिधित्व के लिए अस्पृश्यों की आबादी का प्रश्न कोई महत्व नहीं रखता था। 1932 तक राजनीतिक प्रश्न विधान-मंडल में केवल हिंदुओं तथा मुसलमानों के बीच सीटों के बंटवारे का प्रश्न था। साटों के बारे में ऐसा कोई प्रश्न नहीं था कि हिंदुओं के हिस्से में जो सीटें आएं, उनका बंटवारा स्पृश्यों और अस्पृश्यों के बीच हो। चूंकि पूरे-का-पूरा हिस्सा स्पृश्यों को मिलता था, अतः उन्होंने यह जानने की परवाह ही नहीं की कि अस्पृश्यों की आबादी कितनी थी। 1932 तक यह स्थिति पूर्णतया बदल गई। अब बंटवारे का प्रश्न हिंदुओं और मुसलमानों के बीच, बंटवारे का प्रश्न नहीं रह गया था। अस्पृश्य यह दावा करने लगे कि बंटवारा न केवल हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हो, बल्कि हिंदुओं को जो हिस्सा मिले, उसका और बंटवारा हो और अस्पृश्यों को उनका हिस्सा अलग से मिले और वे ही उसका उपयोग करें। अलगाव के इस दावे को मान लिया गया और अस्पृश्यों को छूट दी गई कि भारतीय गोलमेज सम्मेलन में उनके अपने सदस्य उनका प्रतिनिधित्व करें। इस प्रकार न केवल अस्पृश्यों को अलग अस्तित्व को स्वीकार किया गया, बल्कि भारतीय गोलमेज सम्मेलन की अल्पसंख्यक उप-समिति ने तो यह सिद्धांत भी स्वीकार कर लिया कि नए संविधान के अधीन दलित वर्गों को उनकी आबादी के अनुपात में सभी विधान-मंडलों में प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाए। इस प्रकार अस्पृश्यों की आबादी के विषय को महत्ता प्राप्त हुई। जितनी कम आबादी अस्पृश्यों की होगी, राजनीतिक प्रतिनिधित्व का उतना ही बड़ा हिस्सा स्पृश्य हिन्दुओं को प्राप्त होगा। इससे स्पष्ट हो जाएगा कि जो हिंदू 1932 से पहले अस्पृश्यों की आबादी के प्रश्न पर कोई विवाद करना नहीं चाहते थे, क्यों वे 1932 के बाद अस्पृश्य जैसे वर्ग के अस्तित्व को ही नकारने लगे।

लोथियन कमेटी के सामने अस्पृश्यों की संख्या घटाने के लिए हिंदुओं ने दो दिखावटी आधारों पर जोर दिया। एक यह था कि जनगणना आयुक्त ने जो आंकड़े दिए वे दलित वर्गों के बारे में थे, अस्पृश्यों के बारे में नहीं थे, और दलित वर्ग में अस्पृश्यों के अलावा अन्य वर्ग भी शामिल थे। उनका दूसरा आधार यह था कि अस्पृश्य शब्द की व्याख्या समूचे भारत में एक जैसी होनी चाहिए और अस्पृश्यों की आबादी तय करने के लिए उसे सभी प्रांतों में लागू किया जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में, उन्होंने अस्पृश्यता की स्थानीय कसौटी पर आपत्ति की।

पहला दावा नितांत असत्य था। ‘दलित वर्ग’ शब्द का प्रयोग अस्पृश्यों के पर्याय के रूप में किया गया था। ‘अस्पृश्य’ शब्द के स्थान पर ‘दलित’ शब्द का प्रयोग इसलिए किया गया था कि यह सोचा गया कि ‘अस्पृश्य’ शब्द उन लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाएगा, जिन्हें इस शब्द की परिधि में लाया जाना था। ‘दलित’ शब्द का प्रयोग केवल अस्पृश्यों के लिए किया गया था और इसमें आदिवासी तथा जरायम-पेशा