6. करोड़ों की आबादी को नकारने का प्रयास - Page 151

136 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लोग शामिल नहीं थे। यह बात उस बहस में स्पष्ट कर दी गई थी, जो 1916 में सम्राट की विधायी परिषद (इंपीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल) में माननीय श्री दादाभाई द्वारा प्रस्तुत संकल्प पर हुई थी। सवर्ण हिंदुओं का दूसरा दावा यह था कि अस्पृश्यता की कसौटी एक जैसी होनी चाहिए। इस दावे को प्रस्तुत करने का उद्देश्य अस्पृश्यों की संख्या को कम करना था। सभी जानते हैं कि भारत के अलग-अलग भागों में अस्पृश्यता के अलग-अलग रूप हैं। भारत के कुछ भागों में अस्पृश्य दष्टिवर्जित हैं, यानी उन पर किसी स्पृश्य हिंदू की दृष्टि पड़ जाती है, तो वह अपवित्र हो जाता है। कुछ भागों में वे सामीप्यवर्जित हैं, यानी वे अपवित्र कर देते हैं यदि वे किसी स्पृश्य हिंदू के पास निश्चित दूरी के भीतर आ जाते हैं। इन सामीप्यवर्जितों के भी दो वर्ग हैं। एक वर्ग वह है, जो स्पृश्य हिंदू के पास किसी निश्चित दूरी के भीतर नहीं जा सकता। सामीप्यवर्जितों का दूसरा वर्ग वह है, जो किसी हिंदू के इतना निकट नहीं जा सकता कि उसकी छाया हिंदू पर पड़ जाए। भारत के कुछ भागों में अस्पृश्य दृष्टिवर्जित या सामीप्यवर्जित नहीं है। केवल उसका शारीरिक स्पर्श ही अपवित्र करता है। कुछ भागों में अस्पृश्य वह है, जिसे जल या अन्न को छूने नहीं दिया जाता। कुछ भागों में अस्पश्ृय वह है, जिसे मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया जाता। इन भिन्नताओं से यह स्पष्ट है कि यदि दृष्टिवर्जनीयता को ही अस्पृश्यता की एकमात्र कसौटी माना जाए, तो सामीप्यवर्जितों को अस्पृश्यों की श्रेणी से अलग करना होगा। यदि सामीप्यवर्जनीयता को कसौटी माना जाए, तो स्पर्श मात्र से अपिवत्र करने वालों को अस्पृश्यों की श्रेणी से अलग करना होगा। यदि स्पर्श द्वारा अपवित्र को कसौटी माना जाए तो उन लोगों को अलग करना होगा, जो जल या अन्न नहीं छू सकते। हिंदू यही करना चाहते थे। एक जैसा कसौटी पर आग्रह करके वे कतिपय वर्गों को अस्पृश्यों की श्रेणी से अलग करना चाहते थे, जिससे कि अस्पृश्यों की संख्या कम हो जाए। जाहिर है कि उनका दृष्टिकोण भ्रामक था। अस्पृश्यता किसी व्यक्ति के प्रति किसी हिंदू की आंतरिक घृणा की बाह्य अभिव्यक्ति है। यह घृणा कैसा रूप धारण करती है, वह अपेक्षतः एक नगण्य मामला है। रूप तो केवल घृणा की मात्रा को दर्शाता है। घृणा है जहां, अस्पृश्यता है वहां। यह सहत सत्य हिंदुओं से छिपा नहीं था।

पर वे जोरशोर से कसौटी की एकरूपता का राग अलापते रहे, क्योंकि वे चाहते थे कि जैसे भी हो, अस्पृश्यों की संख्या को कम किया जाए और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बड़े हिस्से को हड़प लिया जाए।

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इसमें संदेह नहीं कि हिंदुओं और अस्पृश्यों के संघर्ष पर मुख्य उपाख्यान आधारित है। पर इस उपाख्यान के भीतर एक और उप-कथा है, जो महत्व से