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करोड़ों की आबादी को नकारने का प्रयास

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भरपूर है। यह है, पिछड़े वर्गों तथा अस्पृश्यों के बीच का संघर्ष। पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधियों का कहना था कि दलित वर्ग नामक श्रेणी में उस शब्द के सीमित अर्थ के अनुसार केवल अस्पृश्यों को ही शामिल न किया जाए, अपितु आर्थिक तथा शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को भी शामिल किया जाए। जो लोग यह चाहते थे कि न केवल अस्पृश्यों को, बल्कि शैक्षिक तथा आर्थिक दृष्टि से पिछड़े लोगों को भी अलग प्रतिनिधित्व दिया ही जाना चाहिए, उनका यह उद्देश्य प्रशंसनीय था। अपने इस सुझाव के द्वारा वे किसी नई चीज की मांग नहीं कर रहे थे। 1920 में जो संशोधित संविधान लागू हुआ, उसके अनुसार भारत के दो प्रांतों, अर्थात् बंबई और मद्रास, में आर्थिक तथा शैक्षिक दृष्टि से पिछड़ी जातियों के अधिकार को मान्यता दी गई। बंबई में मराठों तथा संबद्ध जातियों को और मद्रास में गैर-ब्राह्मणों को केवल इस आधार पर कि वे शैक्षिक तथा आर्थिक दृष्टि से पिछड़े थे, अलग प्रतिनिधित्व दिया गया। आशंका यह थी कि इन जातियों को विशेष प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया, तो सवर्ण हिंदुओं के अल्पसंख्यक जैसे ब्राह्मण तथा संबद्ध जातियां राजनीति के क्षेत्र में उनका दमन करेंगी। अन्य प्रांतों में भी ऐसी ही स्थिति वाली अनेक जातियां हैं। उन्हें विशेष राजनीतिक प्रतिनिधित्व की जरूरत है, ताकि उच्च जातियां उनका दमन न कर सकें। अतः हिंदुओं में से पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधियों दावा पूर्णतया उचित ही था कि उनके लिए विशेष प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाए। ख्1, यदि उनके दृष्टिकोण को स्वीकार कर लिया जाता तो दलित वर्गों के लोगों की संख्या में भारी वृद्धि हो जाती। लेकिन उन्हें अस्पृश्यों अथवा सवर्ण हिंदुओं से कोई समर्थन नहीं मिला। हिंदू ऐसे किसी भी प्रयास के विरुद्ध थे, जिसका उद्देश्य दलित वर्गों की संख्या में वृद्धि करना हो। अस्पृश्य यह नहीं चाहते थे कि उनकी श्रेणी में किसी ऐसे वर्ग के लोगों को शामिल किया जाए, जो वास्तव में अस्पृश्य न हो। इन पिछड़ी जातियों के लिए उचित मार्ग यही था कि वे मांग करते कि स्पृश्य हिंदुओं का विभाजन उन्नत तथा पिछड़े लोगों के रूप में किया जाए, और

  1. संयुक्त प्रांत में पिछड़े वर्गों के लिए ऐसी व्यवस्था की जरूरत थी। यह मांग भी मुख्यतः वहीं से की

गई थी। साइमन कमीशन को दिए गए अपने ज्ञापन में संयुक्त प्रांत की सरकार ने जो कहा है, उसमें

यह जरूरत पर्याप्त रूप से स्पष्ट हो जाती है। संयुक्त प्रांत के विधान-मंडल के गठन के बारे में उसमें

कहा गया है µ ‘समग्र रूप से प्रांत में कुल हिंदू आबादी का 21.5’ प्रतिशत भाग चार प्रमुख हिंदू

जातियों, यानी ब्राह्मणों, ठाकुरों, वैश्यों और कायस्थों का है, लेकिन इन चार जातियों में से कौंसिल में

93 प्रतिशत के लगभग हिंदू सदस्य आए हैं। आबादी का 1.8 प्रतिशत भाग जाटों का है। उसमें से और

पांच प्रतिशत हिंदू सदस्य आए हैं। अन्य हिंदू जातियों के असंख्य लोगों में शामिल करोड़ों लोग जिनमें

वास्तव मे काश्तकार जातियां भी हैं, भले ही वे हिंदू आबादी का 76 प्रतिशत भाग हैं, केवल दो प्रतिशत

प्रतिनिधित्व प्राप्त कर सकते हैं।’ पृ. 500