अस्पृश्यों का विद्रोह
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सभी सार्वजनिक जलाशयों, कुओं, धर्मशालाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिनका निर्माण और रखरखाव सार्वजनिक निधि से किया जाता हो या जो सरकार द्वारा नियुक्त या कानूनी तौर पर बनाए गए निकायों की देखरेख में हों। यह भी कहा गया कि वे सरकारी स्कूलों, अदालतों, कार्यालयों और डिस्पेंसरियों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। सरकार ने यह संकल्प स्वीकार कर लिया और यह आदेश जारी कर दियाः
परिषद के पूर्वोक्त संकल्प के अनुसार बंबई सरकार सहर्ष यह निर्देश देती है
कि जहां तक संकल्प का संबंध सरकारी स्वामित्व और देखरेख वाले सार्वजनिक
स्थलों, संस्थाओं से है, कार्यालयों के सभी अध्यक्ष उसे लागू करें। कलेक्टरों से
अनुरोध किया जाए कि वे अपने अधिकार-क्षेत्र में आने वाले स्थानीय निकायों को
सलाह दें कि वे संकल्प में की गई सिफारिशों को स्वीकार करने की वांछनीयता
पर विचार करें।
सरकार के इस आदेश के अनुसार कोलाबा के कलेक्टर ने महाड नगरपालिका के विचारार्थ उसकी एक प्रति भेजी। महाड नगरपालिका ने 5 जनवरी, 1924 को इस आशय का संकल्प पारित किया कि नगरपालिका को इस बारे में कोई आपत्ति नहीं है कि अस्पृश्यों को तालाब का इस्तेमाल करने दिया जाए। इस संकल्प के पास हो जाने के शीघ्र पश्चात् महाड में कोलाबा जिले के अस्पृश्यों का एक सम्मेलन मेरी अध्यक्षता में हुआ। सम्मेलन की बैठक दो दिन - 18 और 20 मार्च, 1927 को हुइ। कोलाबा जिले में अस्पृश्यों का यह सर्वप्रथम सम्मेलन था। सम्मेलन में 2,500 से अधिक अस्पृश्यों ने हिस्सा लिया। उनमें बड़ा उत्साह था। सम्मेलन के प्रथम दिवस पर मैंने अध्यक्ष पद से अपना भाषण दिया। उसमें मैंने उन्हें प्रेरणा दी कि वे अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करें, वे अपनी गंदी तथा बुरी आदतों को त्याग दें और मानवता की पूरी बुलंदी को स्पर्श करें। उसके बाद वहां उपस्थित तथा अस्पृश्यों की दोस्ती का दम भरने वाले सवर्ण हिंदुओं ने सभा को संबोधित किया। उन्होंने अस्पृश्यों से कहा कि वे साहस से काम लें और और अपने कानूनी अधिकार का इस्तेमाल करें। इसके साथ पहले दिन की कार्यवाही समाप्त हुई। रात को विषय समिति की बैठक हुई। उसमें विचार किया गया कि अगले दिन खुले सम्मेलन में क्या संकल्प प्रस्तुत किया जाए। विषय समिति में कुछ लोगों ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि पीने का पानी प्राप्त करने में अस्पृश्यों को महाड में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। खासकर यह कठिनाई सम्मेलन की स्वागत समिति के सदस्यों ने अनुभव की। उन्हें सम्मेलन में भाग लेने वाले के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी मंगाने के लिए सवर्ण हिंदुओं को लगाना पड़ा और 15 रुपये की विपुल राशि खर्च करनी पड़ी।