144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अगले दिन 20 तारीख को प्रायः 9 बजे सम्मेलन की बैठक हुई। उसमें विषय समिति द्वारा तय संकल्प प्रस्तुत किए गए। सम्मेलन ने उन्हें पास कर दिया। इसमें कुल मिलाकर कोई तीन घंटे लगे। अंत में मेरे एक सहयोगी ने अध्यक्ष तथा सम्मेलन को सफल बनाने वाले अन्य लोगों के प्रति धन्यवाद का प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए जल-प्राप्ति की कठिनाई के प्रश्न का उल्लेख का प्रस्ताव उपस्थित अस्पृश्यों को प्रोत्साहित किया कि वे चावदार तालाब पर जाकर पानी लेने के अधिकार का इस्तेमाल करें, खासकर उस स्थिति में जब कि नगरपालिका ने अपने संकल्प द्वारा घोषणा कर दी है कि वह अस्पृश्यों के लिए खुल गया है और उनके हिंदू मित्र उनकी मदद करने को तैयार हैं। जिन हिंदुओं ने उन्हें प्रोत्साहित किया था कि वे निर्भय होकर अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने लगें, उन्होंने तत्काल अनुभव किया कि यह तो विस्फोटक स्थिति पैदा हो गई है और वे तुरंत भाग खड़े हुए। लेकिन अस्पृश्यों पर इसका भिन्न प्रभाव पड़ा। इस ललकार से तो उनकी रंगों में जैसे बिजली दौड़ गई। वे एकजुट होकर खड़े हो गए और मेरे तथा मेरे सहयोगियों के नेतृत्व में 2,500 अस्पृश्य लोगों के जत्थे ने मुख्य सड़कों पर जुलूस निकाला। यह समाचार दावाग्नि की भांति फैल गया और जुलूस देखने के लिए सड़कों पर लोगों की भीड़ जमा हो गई।
नगर के हिंदुओं ने यह दृश्य देखा। वे अवाक रह गए। उनके लिए यह एक अभूतपूर्व दृश्य था। कुछ क्षणों के लिए तो लगा कि वे स्तब्ध रह गए थे। चार-चार की कतार में जुलूस चलता रहा। वह चावदार तालाब पर पहुंचा। अस्पृश्यों ने पहली बार वहां पानी पीया। शीघ्र ही हिंदुओं ने अनुभव किया कि यह सब क्या हो गया। उन पर पागलपन सवार हो गया और उन्होंने उन अस्पृश्यों पर जी-भर का जुल्म ढाए, जिन्होंने पानी को भ्रष्ट करने का दुस्साहस किया था। उनके अत्याचारों का उल्लेख उपयुक्त स्थानों पर किया जाएगा।
महाड में चावदार तालाब पर अस्पृश्यों के प्रवेश करने पर जब हिंदुओं ने उन पर आक्रमण किया, तो निस्संदेह वह उनके लिए एक चुनौती बना गया। इसके अलावा अस्पृश्य इस बात के लिए तुले हुए थे कि वे केवल अपने अधिकार के इस्तेमाल से ही संतुष्ट नहीं हो जाएंगे, बल्कि देखेंगे कि वह अच्छी तरह स्थापित भी हो जाएं। उनके लिए यह सोचना स्वाभाविक ही था कि वे हिंदुओं की चुनौती को स्वीकार करें ही। तदनुसार अस्पृश्यों का एक दूसरा सम्मेलन बुलाया गाय। अस्पृश्यों को बताया गया कि वे सत्याग्रह के लिए (अर्थात् सविनय अवज्ञा तथा जेल जाने के लिए भी) पूरी तरह तैयार होकर आएं।
जब हिंदुओं को इसका पता चला तो उन्होंने कोलाबा के जिला मजिस्ट्रेट से आवेदन किया कि वह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 के अधीन आदेश जारी कर