अस्पृश्यों का विद्रोह
145
दें, ताकि अस्पृश्य चावदार तालाब पर जाकर उसके जल को अपवित्र न कर सकें। जिला मजिस्ट्रेट ने मना कर दिया और कहा कि तालाब एक सार्वजनिक तालाब है और सभी नागरिकों के लिए खुला हुआ है, और वह कानून के अनुसार अस्पृश्यों को वहां से पानी लेने से नहीं रोक सकते। मजिस्ट्रेट ने उन्हें सलाह दी कि वे अदालत जाएं और अपने एकमात्र उपभोक्ता होने के अधिकार को सिद्ध करें। यह तय किया गया कि सम्मेलन 25, 26, 27 दिसंबर, 1927 को होगा। तिथियां नजदीक आती गईं और उन्होंने सुना कि अस्पृश्य नितांत गंभीर थे। उन्हें यह भी पता था कि जिला मजिस्ट्रेट ने उनकी सहायता करने से इंकार कर दिया था। अतः उनके पास केवल एक ही उपाय रह गया कि वे अपने इस अधिकार को कानून द्वारा सिद्ध करें कि सार्वजनिक तालाब से अस्पृश्य पानी नहीं ले सकते। तदनुसार विभिन्न जातियों के नौ हिंदू वादी बने और उन्होंने मिलकर 12 दिसंबर, 1927 को 1927 का दावा संख्या 405 दायर किया। हिंदुओं के प्रतिनिधियों ने यह दावा महाड के उप-न्यायाधीश की अदालत में दायर किया। अस्पृश्यों के प्रतिनिधि के रूप में मैं तथा चार अन्य लोग प्रतिवादी बने। दावे का उद्देश्य था कि अदालत से यह आदेश प्राप्त किया जाए कि ‘उक्त चावदार तालाब केवल स्पृश्य वर्गों की निजी संपत्ति है और अस्पृश्यों को कोई अधिकार नहीं है कि वे उस तालाब पर जाकर वहां से पानी लें। इस बारे में भी स्थाई आदेश दिया जाए कि इनमें से कोई भी कार्य प्रतिवादी नहीं कर सकते।’ जिस दिन दावा दायर किया गया, उसी दिन वादियों ने अदालत से आवेदन किया कि प्रतिवादियों के खिलाफ अस्थाई आदेश दिया जाए, ताकि वे मुकदमे के फैसले तक तालाब पर जाकर वहां से पानी न ले सकें। न्यायाधीश ने यह मानकर कि यह एक उपयुक्त केस है 14 दिसंबर, 1927 को मेरे तथा अन्य प्रतिवादियों के खिलाफ अस्थाई निषेधाज्ञा दे दी।
न्यायाधीश द्वारा जारी की गई अस्थाई निषेधाज्ञा बंबई भेजी गई और मुझ पर सम्मेलन होने से दो-तीन दिन पहले तामील की गई। सलाह के लिए कोई समय था ही नहीं और सम्मेलन को स्थगित भी नहीं किया जा सकता था। मैंने निर्णय का मामला सम्मेलन पर छोड़ दिया।
सम्मेलन बुलाने का खास उद्देश्य था कि तालाब से पानी लेने के जिस अधिकार को पिछली बार हिंदुओं ने चुनौती दी, उसे स्थापित किया जाए। जिला मजिस्ट्रेट ने मार्ग को खुला रखा था। लेकिन अब तो न्यायाधीश ने ऐसा कार्यवाही पर रोक का आदेश जारी कर दिया था। स्वाभाविक है कि जब सम्मेलन की बैठक हुई तो उसके विचारार्थ सबसे पहला सवाल यह था कि अदालत द्वारा जारी की गई निषेधाज्ञा को भंग करके तालाब पर प्रवेश किया जाए या नहीं। पहले जो जिला मजिस्ट्रेट अस्पृश्यों