146 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के प्रति सहानुभूति रखता था, अब उसने एक भिन्न रवैया अपनाया। सम्मेलन को जब स्वयं आकर मजिस्ट्रेट ने संबोधित किया तो उसने अपने दृष्टिकोण को पूर्णतया स्पष्ट कर दिया। उसने कहा कि यदि दीवानी अदालत ने निषेधाज्ञा जारी न की होती तो वह सवर्ण हिंदुओं की उपेक्षा करके तालाब पर अपने के अस्पृश्यों के प्रयास में उनकी सहायता करता, लेकिन चूंकि उप-न्यायाधीश ने अपना आदेश जारी कर दिया था, अतः उसकी स्थिति भिन्न हो गई है। वह अस्पृश्यों को तालाब पर जाने की अनुमति नहीं दे सकता, क्योंकि ऐसे कार्य का परोक्ष अर्थ होगा कि बिना किसी दंड के सम्राट के न्यायालय के आदेश को भंग करने में उन्हें सहायता दी जाए। अतः उसे लगा कि उसे बाध्य होकर अस्पृश्यों पर रोक लगाने का आदेश जारी करना पड़ेगा, यदि वे निषेधाज्ञा के होते हुए तालाब पर जाने का आग्रह करें। कारण यह नहीं था कि वह हिंदुओं का पक्ष लेना चाहता था, बल्कि यह था कि वह दीवानी अदालत की गरिमा की रक्षा के लिए बाध्य था और उसे देखना था कि आदेश का पालन हो।
सम्मेलन ने कलेक्टर के कथन पर और हिंदुओं की उस प्रतिक्रिया पर भी विचार किया, जो अदालत से प्राप्त आदेश का उल्लंघन करके तालाब पर जाने के अस्पृश्यों के प्रयास के प्रति हिंदुओं की होती। अंततः सम्मेलन इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि उनकी बेहतरी और सुरक्षा इसी में होगी कि कानून का पालन किया जाए और देखा जाए कि अधिकार प्राप्त करने में वह कहां तक मददगार सिद्ध हो सकता है। अतः निश्चय किया गया कि मुकदमे का अंतिम फैसला होने तक न्यायाधीश के आदेश की सविनय अवज्ञा को स्थगित कर दिया जाए।
सविनय अवज्ञा की कभी नौबत ही नहीं आई, क्योंकि मुकदमें में अस्पृश्यों की जीत और हिंदुओं की हार हुई। जिन कारणों से अस्पृश्यों ने कानून का पालन किया और सविनय अवज्ञा को स्थगित किया, उनमें से एक प्रमुख कारण यह था कि वे इस प्रश्न पर अदालत का निर्णय पाना चाहते थे कि क्या अदालत अस्पृश्यता की प्रथा को वैध ठहरा सकती है? कानून का नियम है कि जिस प्रिा को वैध ठहराना हो, उसे अति प्राचीन होना ही चाहिए, उसे निश्चित होना ही चाहिए, उसे ऐसा होना ही चाहिए कि वह नैतिकता अथवा लोक-नीति के प्रतिकूल न हो। अस्पृश्यों का दृष्टिकोण है कि यह ऐसी प्रथा है, जो नैतिकता और लोक-नीति के प्रतिकूल है। लेकिन इसक सार्थकता तभी है, जब कोई न्यायाधिकरण उसके बारे में ऐसी घोषणा करे। अस्पृश्यता की प्रथा को अवैध घोषित करने वाला ऐसा कोई निर्णय निश्चय ही नागरिक अधिकारों के लिए अस्पृश्यों के संघर्ष में अति महत्वपूर्ण सिद्ध होगा, क्योंकि नागरिक मामलों में अस्पृश्यता को लाना अवैध दीख पड़ेगा। चावदार तालाब विवाद में अस्पृश्यों की जीत कोई मामूली जीत नहीं थी। लेकिन एक प्रकार से वह निराशाजनक थी, क्योंकि