7. अस्पृश्यों का विद्रोह - Page 162

अस्पृश्यों का विद्रोह

147

बंबई उच्च न्यायालय ने इस प्रश्न का निर्णय नहीं किया कि अस्पृश्यता की प्रथा वैध थी या नहीं। उसने मुकदमे का फैसला हिंदुओं के खिलाफ इस आधार पर दिया कि हिंदू यह सिद्ध नहीं कर सके कि तालाब के मामले में उन्होंने जिस प्रथा का हवाला दिया, वह अति प्राचीन थी। उसकी राय थी कि स्वयं प्रथा को सिद्ध नहीं किया जा सका। तालाब अस्पृश्यों के लिए खोल दिया गया। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि अस्पृश्यों ने अपना उद्देश्य प्राप्त कर लिया। मुख्य मुद्दा यह था कि अस्पृश्यता की प्रथा वैध प्रथा थी या नहीं। दुर्भाग्य से उच्च न्यायालय ने उस प्रश्न पर निर्णय नहीं दिया। अतः अस्पृश्यों को अपना संघर्ष जारी रखना पड़ा।

III

सीधी कार्यवाही के इस इतिहास में जो दूसरा उल्लेखनीय प्रयास है, उसका संबंध नासिक के कालाराम मंदिर नामक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर में अस्पृश्यों के प्रवेश से है। सीधी कार्यवाही के ये वे उदाहरण हैं, जिनका लक्ष्य विशिष्ट प्रयोजनों की प्राप्ति था। इस आंदोलन में सीधी कार्यवाही के दो मामले शामिल हैं। उनका उद्देश्य था कि हिंदू समाज-व्यवस्था को बारूद लगाकर समूल नष्ट कर दिया जाए। एक तो ‘मनुस्मृति’ का जलाया जाना है। दूसरा है कि अस्पृश्यों ने सामूहिक रूप से कह दिया कि वे न तो हिंदुओं के मृत पशुओं को उठाएंगे और न ही उनकी खाल उतारेंगे।

‘मनुस्मृति’ को महाड में 20 दिसंबर, 1927 का जलाया गया। यह समारोह इस अभियान का अंग था कि चावदार तालाब से पानी लेने के अधिकार को स्थापित किया जाए। ‘मनुस्मृति’ को खुलेआम सार्वजनिक रूप से जलाया गया। इस अवसर पर अस्पृश्यों का एक सम्मेलन हुआ। ‘मनुस्मृति’ को जलाने से पूर्व सम्मेलन ने कतिपय संकल्प पारित किए। इन संकल्पों ने अस्पृश्यों के आंदोलन के इतिहास में एक कीर्तिमान स्थापित किया है। अतः उन्हें नीचे उद्धृत किया जाता हैः

संकल्प संख्या 1 µ हिंदू के अधिकारों की घोषणा

इस सम्मेलन का यह दृढ़ मत है कि हिंदू समाज की वर्तमान दयनीय दशा

केवल यह दर्शाती है कि किस प्रकार किसी समाज का पतन हो जाता है, जब

वह सामाजिक अन्याय को सहन करने लगता है, गलत धार्मिक आस्थाओं का

अनुसरण करने लगता है और आर्थिक अन्यायों का समर्थन करने लगता है। हिंदू

समाज का पतन केवल इस कारण हुआ है कि आम लोगों ने यह जानने की चेष्टा

नहीं की है कि किसी मानव के जन्मसिद्ध अधिकार क्या हैं। इसकी भी उन्होंने

चेष्टा नहीं की है कि उन्हें मान्यता मिले और स्वार्थी लोगों के घटिया कारनामों

और कुकृत्यों की अवज्ञा की जाए। हर व्यक्ति का यह पुनीत कर्तव्य है कि वह