8. असहाय स्थिति - Page 177

162 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

दोनों समूह बराबर के जोड़ के नहीं हैं। किसी भी गांव में सवर्ण हिंदुओं की तुलना में अस्पृश्यों की संख्या अधिक नहीं है। अधिकांशतः उनके कुछ ही परिवार होते हैं, और उनकी संख्या इतनी नगण्य होती है कि वे सवर्ण हिंदुओं के किसी हमले का सामना नहीं कर सकते। भले ही अस्पृश्यों की संख्या पांच करोड़ है और वह काफी बड़ी संख्या दीख पड़ती है, पर वास्तव में वे भारत-भर के गांवों में बिखरे हुए हैं। अतः हर गांव में वे अति अल्प संख्या में हैं और उनकी तुलना में सवर्ण हिंदुओं का भारी बहुमत है। सामरिक महत्व की दृष्टि से देखा जाए तो वे इतनी बुरी तरह बिखरे हुए हैं कि वे सवर्ण हिंदुओं पर हावी नहीं हो सकते, अपितु सवर्ण हिंदु ही उन पर हावी होंगे।

जहां तक संख्या का संबंध है, कुछ प्रांतों के गांवों में मुसलमानों की स्थिति भी अस्पृश्यों जैसी ही है। वे भी गांवों में बिखरे हुए हैं और कुछ गांवों में तो उनकी संख्या अस्पृश्यों की संख्या से भी कहीं कम है, फिर भी मुसलमानों को अस्पृश्यों की भांति हिंदओं से असुविधाएं तथा अपमान नहीं झेलने पड़ते। यह कुछ विचित्र-सी बात है, क्योंकि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच भी उतना ही गहरा मनमुटाव है, जितना कि हिंदुओं और अस्पृश्यों के बीच। व्यवहार से यह अंतर एक लाभ के कारण है। मुसलमानों को यह लाभ मिलता है, पर अस्पृश्यों को नहीं मिलता।

सभी प्राचीन समाजों का यह नियम था कि अजनबी पवित्र हैं। अनादर और आघात से उसके व्यक्तिगत की रक्षा की ही जानी चाहिए। रोमनों के आतिथ्य संबंधी अपने नियम थे और अजनबी के प्रति कर्तव्य, रिश्तेदार के प्रति कर्तव्यों से भी कठोर थे। प्लेटो कहते हैं, ‘जिसमें सावधानी का जरा-सा भी कतरा बाकी है, वह इस बात का भरसक प्रयास करेगा कि वह जीवन-भर अजनबी के प्रति पापाचरण नहीं करेगा।’ यह विचित्र बात है कि किसी अजनबी के व्यक्तित्व को इतनी पवित्रता प्रदान की जाए। इसमें संदेह नहीं कि अजनबी के व्यक्तित्व को प्रति यह पवित्रता विशुद्ध दयाभाव से नहीं उपजी थी। सामूहिक जीवन का समूचा आचरण समूह सक बाहर के लोगों के प्रति सामान्य सहानुभूति का विरोध करता है। अजनबी को क्यों पवित्र और उसके व्यक्तित्व को क्यों अलंघनीय माना गया, इसका वास्तविक कारण यह था कि वह विरोधी समूह का होता था और यदि उसे कोई क्षति पहुंचाई जाती, तो निश्चित था कि रक्तपात होता ही। रक्तपात के भय के कारण ही अजनबी के प्रति वह रुख अपनाया गया।

यही बात गांव के मुसलमानों पर लागू होती है। हिंदुओं की नजरों में वह अजनबी होता है। लेकिन हिंदू उसे छेड़ने की हिम्मत नहीं करते, क्योंकि वे जानते हैं कि यदि उसे कोई क्षति पहुंचाई गई तो प्रतिशोध में मुसलमान हिंदुओं का खून बहा देंगे।