असहाय स्थिति
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हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगों मे वास्तव में खून-खराबे होते हैं और वे तभी होते हैं, जब किसी मुसलमान अथवा किन्हीं मुस्लिम हितों को क्षति पहुंचाई जाती है। रक्तपात के इस भय के कारण ही हिंदुओं के गांव में मुसलमान का जीवन सुरक्षित बना रहता है।
यदि किसी अस्पृश्य को क्षति पहुंचाई जाए तो उसका प्रतिरोध लेने वाला है ही नहीं। रक्तपात को कोई भय है ही नहीं। अतः अस्पृश्यों के प्रति हिंदू कोई भी अन्याय कर सकते हैं और दंड से बच निकलते हैं। इसका कारण है कि मुसलमान एकजुट हैं। वे गहरी मानसिक चेतना से परस्पर आबद्ध हैं। यदि उनके संप्रदाय या किसी व्यक्ति के प्रति कोई अन्याय किया जाए, तो वे एक होकर उस अन्याय का प्रतिकार करने के लिए तैयार हो जाते हैं। दूसरी ओर, अस्पृश्य असंगठित हैं। वे जात-पांत के बंधन से जकड़े हुए हैं। सवर्ण हिंदू की भांति वे भी जात-पांत में विश्वास करते हैं। इस जात-पांत से अस्पृश्यों के बीच आपसी द्वेष और होड़ पैदा हो गई है। उसकी वजह से संयुक्त कार्रवाई असंभव हो गई है। मुसलमानों के बीच भी जात-पांत है। अस्पृश्यों की भांति वे भी समूचे देश में बिखरे हुए हैं। लेकिन उनका मजहब उनके बीच उन्हें जोड़ने वाला मजबूत धागा है। उनका मजहब उन्हें सिखाता है कि वे सब मुस्लिम संप्रदाय के भाग हैं। अस्पृश्यों के मानस में ऐसी भावना भरने वाला कोई भाव नहीं है। एकजुटता की भावना के अभाव में अस्पृश्य खंडों में बंटे हुए हैं। उन्हें जोड़ने वाली कोई चीज नहीं है। अतः उनकी संख्या उनके लिए बेकार है।
गांव के अस्पृश्य अधिकांशतः या तो गांव के सेवक हैं या भूमिहीन मजदूर हैं। गांव के सेवक के रूप में अपने भरण-पोषण के लिए हिंदुओं पर आश्रित हैं। वे घर-घर जाकर हर रोज हिंदुओं से रोटी या रांधा गया भोजन प्राप्त करते हैं। बदले में वे हिंदुओं की कुछ प्रथागत सेवाएं करते हैं। यह उनके पारिश्रमिक का एक अंश है। अंशतः वे अपने पारिश्रमिक के रूप में हिंदुओं के घरों से फसल की कटाई पर अनाज भी प्राप्त करते हैं। जब भी हिंदुओं और अस्पृश्यों के बीच कोई मतभेद होता है, तो पहला काम हिन्दू यह करते हैं कि वे अस्पृश्यों को रोटी और कटाई के हिस्से का उनका अनाज नहीं देते। वे अस्पृश्यों को किसी काम पर भी नहीं लगाते। नतीजा यह होता है कि संघर्षरत अस्पृश्यों को भुखमरी का सामना करना पड़ता है।
अस्पृश्यों के पास गांव में जीविका का कोई साधन नहीं रह जाता। वह दूध या सब्जी बेचने जैसा कोई धंधा नहीं कर सकता है। अस्पृश्य होने के कारण उससे कोई ये चीजें खरीदेगा ही नहीं। वह कोई व्यापार भी नहीं कर सकता है, क्योंकि सभी व्यापार पुश्तैनी होते हैं। अतः कोई भी उसकी सेवा स्वीकार नहीं करेगा। आर्थिक रूप से वह पूर्णतः हिंदू पर आश्रित है। जब भी स्पृश्य को यह लगता है कि अस्पृश्य अहंकारी