8. असहाय स्थिति - Page 179

164 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

या शरारती हो गया है, तो वह इस आर्थिक स्थिति का भरपूर लाभ उठाता है।

अस्पृश्य न केवल अपनी रोजी-रोटी के लिए स्पृश्य का मुंह जोहता है, बल्कि जीवन की दैनिक जरूरतों की पूर्ति के लिए भी उसकी यही नियति है। गांवों में सभी दुकानें स्पृश्यों की होती हैं। व्यापार स्पृश्य के हाथ में है और अनिवार्यतः होगा भी। अतः खरीदारी के लिए अस्पृश्य को स्पृश्य दुकानदार के आसरे रहना पड़ता है। अस्पृश्य दैनिक जरूरत की चीजें तभी प्राप्त कर सकेगा, जब स्पृश्य वे चीजें बेचना चाहेगा। यदि स्पृश्य बेचना नहीं चाहता, तो अस्पृश्य को भूखों मरना ही पड़ेगा, भले ही उसके पास पैसा हो। अतः जब भी स्पृश्य और अस्पृश्य के बीच कोई विवाद उत्पन्न हो जाता है, तो दुकानदारों को स्पृश्य यह आदेश देना नहीं भूलता कि अस्पृश्यों को कोई चीज न बेची जाए। स्पृश्य संगठित रूप से ऐसी साजिश करते हैं कि अस्पृश्यों से आर्थिक रिश्ता पूर्णतया टूट जाए। अस्पृश्यों के खिलाफ लड़ाई का एलान कर दिया जाता है। ‘शत्रु’ को तहस-नहस करने के के लिए दुष्टों का एक दंडात्मक अभियान दल अस्पृश्यों के क्षेत्र में भेज दिया जाता है। वह दल निर्भय होकर विध्वंस करता है। वह घरों को जला देता है, संपत्ति को नष्ट करता है। सभी के प्रति वह निर्लज्ज होकर हिंसा के कर्म करता है। वह औरतों और बच्चों को भी नहीं बख्शता।

सर्वाधिक सामान्य और प्रभावी हथियार यह है कि अपराधी अस्पृश्यों के पूर्ण बहिष्कार की घोषणा कर दी जाती है। ‘बहिष्कार’ केवल गांधी के ‘असहयोग’ का ही दूसरा रूप है। उसकी विभीषिका का वर्णन नहीं किया जा सकता। पिछड़े वर्गों की शिकायतों की जांच के लिए बंबई सरकार ने जो कमेटी नियुक्त की थी, उसने सामाजिक बहिष्कार का वर्णन इस प्रकार किया हैः

हालांकि हमने ऐसे विभिन्न उपायों की सिफारिश की है कि सभी सार्वजनिक उपयोगिताओं संबंधी अपने अधिकारों को अस्पृश्य प्राप्त कर सकें, फिर भी हमें डर है कि आने वाले लंबे अर्से तक अधिकार के प्रयोग के उनके मार्ग में अड़चनें आएंगी। पहली अड़चन तो यह आशंका है कि रूढि़वादी वर्ग उनके खिलाफ खुली हिंसा करेंगे। इस बात की ओर ध्यान देना ही होगा कि हर गांव में अस्पृश्य अल्प संख्या में हैं। उनके विरोध में रूढि़वादियों का भारी बहुमत है, जो अस्पृश्यों के किसी भी संभावित हमले से अपने हितों और प्रतिष्ठा की रक्षा करने के लिए सब-कुछ करेगा। पुलिस की कार्यवाही के खतरे से रूढि़वादी वर्गों के हिंसा के हौंसले पर अंकुश लग गया है। अतः ऐसे मामले विरल हो गए हैं।

दूसरी अड़चन अस्पृश्यों की वर्तमान आर्थिक स्थिति से पैदा होती है। प्रेसिडेंसी

के अधिकांश भागों में अस्पृश्य आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं हैं। कुछ लोग