असहाय स्थिति
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असामी के रूप में रूढि़वादी वर्गों की भूमि जोतते हैं। ये असामी उनकी इच्छा के दास हैं। कुछ लोग रूढि़वादी वर्गों के खेतों पर मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं। शेष रूढि़वादी वर्गों के घरों से भोजन या अनाज प्राप्त करते हैं। बदले में वे गांव के सेवक के रूप में सेवा करते हैं। हमने ऐसे अनेक उदाहरण सुने हैं, जहां जब भी गांव के दलित वर्गों ने अपने अधिकारों के प्रयोग का साहस जुटाया, तो वहां के रूढि़वादी वर्गों ने हथियार के रूप में अपनी इस आर्थिक शक्ति को आजमाया है और उन्हें अपनी भूमि से बेदखल कर दिया है। उन्हें रोजगार से हटा दिया गया है और गांव के सेवक के रूप में उनका पारिश्रमिक बंद कर दिया गया है। प्रायः बहिष्कार की योजना बड़े पैमाने पर बनाई जाती है। उसके अंतर्गत अस्पृश्य आम रास्तों पर नहीं चल सकते। वे ग्राम के बनिए या दुकानदार से दैनिक जरूरत की चीजें नहीं खरीद सकते। साक्ष्य के अनुसार बहुधा छुटपुट कारणों के आधार पर ही अस्पृश्यों के खिलाफ सामाजिक बहिष्कार की घोषणा कर दी जाती है, जैसे यदि कोई अस्पृश्य सांझे कुंए से पानी भरने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करे। लेकिन ऐसे मामले भी कम नहीं हैं, जहां कठोर-से-कठोर बहिष्कार की घोषणा कर दी गई। कारण बस इतना-सा था कि किसी अस्पृश्य ने जनेऊ धारण कर लिया, भूमि का टुकड़ा खरीद लिया अच्छे कपड़े या जेवर, पहन लिए या सार्वजनिक मार्ग पर दूल्हे को घोड़ी पर बिठाकर शादी का जुलूस निकाल दिया।
हम नहीं कह सकते हैं कि अस्पृश्यों के दमन के लिए इस सामाजिक बहिष्कार से भी अधिक प्रभावी कोई और हथियार खोजा जा सकता है। खुली हिंसा का उपाय भी इसके सामने फीका पड़ जाता है, क्योंकि इसके अति दूरगामी और घातक प्रभाव पड़ते हैं। यह अधिक खतरनाक है, क्योंकि सहमति पर आधारित आजादी के सिद्धांत संगत वैध उपाय के रूप में यह चलता रहता है। हम सहमत हैं कि बहुसंख्यकों के इस अत्याचार को सख्ती से कुचला जाए, यदि हम अस्पृश्यों को उनके उद्धार के लिए वाणी और कर्म की आवश्यक आजादी की गारंटी देना चाहते हैं।
IV
तीसरी अड़चन जो अस्पृश्यों की असहाय स्थिति को विकट बनाती है, वह यह है कि अस्पृश्यों के लिए यह संभव नहीं कि वे पुलिस से सुरक्षा और अदालतों से न्याय प्राप्त कर सकें। पुलिस से लोग सवर्ण हिंदुओं के वर्गों से भरती किए जाते हैं। मजिस्ट्रटों के पद पर भी सवर्ण हिंदुओं के लोग होते हैं। पुलिस और मजिस्ट्रेटों के