166 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
वर्ग से सवर्ण हिंदुओं का नाता सगे-संबंधी जैसा है। अस्पृश्यों के प्रति वे भी सवर्ण हिंदुओं की भांति भावनाओं और पूर्वाग्रहों से ग्रस्त रहते हैं। यदि कोई अस्पृश्य किसी पुलिस अधिकारी के पास सवर्ण हिंदू के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने जाता है तो सुरक्षा के स्थान पर उसे ढेर सारी गालियां सुननी पड़ती हैं। यह तो उसे शिकायत दर्ज किए बिना ही भगा दिया जाता है या रिपोर्ट ऐसी झूठी दर्ज की जाती है कि उसमें स्पृश्य हमलावरों को बच निकलने का मार्ग मिल जाता है। यदि वह मजिस्ट्रेट की अदालत में अपराधियों के खिलाफ मुकदमा दायर करता है तो उस पर क्या कार्रवाई होगी, यह पहले ही मालूम हो जाता है। किसी अस्पृश्य को कोई हिंदू गवाही देने के लिए नहीं मिलेगा, क्योंकि गांव में पहले ही षडयंत्र रच दिया जाता है कि कोई भी अस्पृश्य की हिमायत नहीं करेगा, चाहे सच कुछ भी क्यों न हो। यदि वह गवाह के रूप में अस्पृश्यों को पेश करता है तो मजिस्ट्रेट उनकी गवाही स्वीकार नहीं करेगा, क्योंकि वह आसानी से कह देगा कि वह तो उसी का हितैषी है, इसलिए उसे स्वतंत्र गवाह नहीं कहा जा सकता। यदि वे स्वतंत्र गवाह हैं भी तो मजिस्ट्रेट के सामने एक आसान-सी तरीका यह कह देना है कि उसे अस्पृश्य के पक्ष में गवाह सच्चा नहीं प्रतीत होता। वह निडर होकर ऐसा फैसला सुना देगा, क्योंकि वह भली-भांति जानता है कि उसके ऊपर कोई अदालत उसके इस फैसले को नहीं बदलेगी, क्योंकि यह एक स्थापित नियम है कि अपील सुनने वाली अदालत मजिस्ट्रेट के फैसले में दखल न दे, जो गवाहियों पर आधारित है और जिनकी उसने जांच की है। इस तथ्य को तो अब अस्पृश्यों के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने भी स्वीकार कर लिया है।
‘हिंदू’ के 7 मार्च, 1938 के अंक में प्रकाशित 30 सितंबर 1937 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए तमिलनाडु हरिजन सेवक संघ की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया हैः
दूरदराज के गांवों में इन अधिकारों ने हरिजनों की राजनीतिक चेतना को तो
जगाया है, पर वहां हरिजन के लिए सदैव ऐसा करना संभव नहीं है। वहां तो
केवल पुलिस वालों का राज चलता है। वहां हरिजन द्वारा अपने अधिकारों पर
आग्रह किए जाने का अर्थ है कि उसके और सवर्णों के बीच संघर्ष होगा और
संघर्ष में सदा ही सवर्ण का पलड़ा भारी रहता है। इस संघर्ष का स्वाभाविक
परिणाम यह होगा कि पुलिस या मजिस्ट्रेट के पास शिकायत की जाएगी। मजिस्ट्रेट
के पास जाना हरिजन के बूते से बाहर है और पुलिस में शिकायत करने का
नतीजा और भी खराब होगा। अनेक मामलों में इन शिकायतों की कभी कोई
जांच नहीं होती। कई अन्य मामलों में सदा सवर्णों के पक्ष में फैसला दर्ज किया
जाता है। पुलिस में हमने जो शिकायतें कीं, उनका भी यही परिणाम हुआ। हमें
समस्या यह दीख पड़ती है कि पुलिस के निचले कर्मचारियों की मानसिकता