असहाय स्थिति
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में कोई बदलाव नहीं आया है। या तो वे हरिजन के अधिकारों से नावाकिफ
हैं, जिनकी रक्षा करने की उनसे अपेक्षा होती है या वे सवर्णों के प्रभाव में आ
जाते हैं। यह भी संभव है कि वह नितांत उदासीन रहते हैं। अन्य मामलों में धनी
द्वारा सवर्ण की तरफदारी भ्रष्टाचारवश की जाती है।
इसका अर्थ है कि अधिकारी अस्पृश्य-विरोधी और हिंदू-समर्थक होता है। जब भी उसे अपने किसी अधिकार या विवेक का प्रयोग करना होता है, तो वह उसका प्रयोग पूर्वाग्रह से अस्पृश्य के विरुद्ध करता है।
पुलिस कर्मचारी और मजिस्ट्रेट अक्सर भ्रष्ट होते हैं। यदि वे केवल भ्रष्ट हों तो स्थिति संभवतः उतनी खराब न हो, क्योंकि भ्रष्ट अधिकारी को तो कोई भी पक्ष
खरीद सकता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पुलिस कर्मचारी या मजिस्ट्रेट भ्रष्ट होने की अपेक्षा अधिक पक्षपातपूर्ण होते हैं। हिंदुओं के प्रति उनके इस पक्षपातपूर्ण और अस्पृश्यों के प्रति विरोधपूर्ण रवैय के कारण ही अस्पृश्यों को न्याय और सुरक्षा नहीं मिल पाती। एक के प्रति पक्षपात और दूसरे के प्रति विरोध का कोई निदान नहीं है, क्योंकि यह सामाजिक और धार्मिक नफरत की भावना पर आधारित है, जो हर हिंदू में जन्मजात होती है। पुलिस तथा मजिस्ट्रेट को अपनी प्रेरणाओं, अपने हितों और संस्कारों के कारण अस्पृश्यों की भावनाओं के साथ सहानुभूति नहीं होती। वे उस अभाव, पीड़ा, लालसा और इच्छाओं से अनुप्राणित नहीं होते, जो अस्पृश्यों को उद्वेलित किए रहती हैं। इसके फलस्वरूप वे लोग अस्पृश्यों की आकांक्षाओं के प्रति खुलकर विरोधी और विद्वेषपूर्ण हो जाते हैं, उन्हें आगे नहीं बढ़ने देते, उनके ध्येय-हित की उपेक्षा करते हैं और ऐसी हर चीज को काट देते हैं, जिसमें अस्पृश्यों को गर्व और आत्म-सम्मान मिल सके। दूसरी ओर, वे हिंदुओं का उनके हर काम में साथ देते हैं, उनके साथ पूरी सहानुभूति रखते हैं, जिससे उनकी शक्ति, क्षमता, मान-मर्यादा और प्रतिष्ठा बनी रहे। जब कभी इन दोनों में संघर्ष होता है, तब वे अस्पृश्यों के इस विद्रोह को कुचलने में हिंदुओं के एजेंट के रूप में कार्य करते हैं और खुलेआम निर्लज्ज होकर हिंदुओं के हर घिनौने काम में हर संभव, उचित-अनुचित सहायता भी देते हैं, जिससे अस्पृश्यों को उनकी करनी का फल चखाया जा सके और वे ऊपर उठने न पाएं।
इसका सबसे अधिक बुरा पक्ष यह है कि यह सब अन्याय और अत्याचार कानून की सीमाओं के अंदर किया जा सकता है। कोई हिंदू यह साफ तौर पर कह सकता है कि वह किसी भी अस्पृश्य को काम पर नहीं लगाएगा, उसे कोई चीज नहीं बेचेगा, उसे अपने खेतों से बेदखल कर देगा और किसी कानून को तोड़े बिना भी वह उसके मवेशियों को अपने खेतों से होकर नहीं जाने देगा। ऐसा करके वह अपने अधिकार का ही इस्तेमाल कर रहा है। कानून इसकी परवाह नहीं करता कि उसकी मंशा क्या