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उनकी कामनाएं हमारे लिए कानून हैं
I. धर्म के स्थान पर अधर्म,
II. मनु और कर्म,
III. आधुनिक प्रतिरूप, तथा
IV. चरित्र और दृष्टिकोण पर धर्म का प्रभाव।
जो भी अस्पृश्यों के आंदोलन को कुचलने के लिए हिंदुओं की अराजकरत के बारे में पढ़ता है, मुझे विश्वास है कि उसे गहरा धक्का लेगा। निश्चय ही वह यह सवाल पूछेगा कि किस कारण हिंदू इस अराजकता में लिप्त होता है। कोई भी यह नहीं कहेगा कि ऐसा प्रश्न स्वाभाविक प्रश्न नहीं होगा, और मामले की परिस्थतियों को देखते हुए अति संगत प्रश्न यह होगा कि अस्पृश्य यदि साफ वस्त्र पहनता है तो उस पर अत्याचार क्यों किया जाए? हिंदू को उससे क्या आघात पहुंच सकता है? अस्पृश्य के साथ क्यों छेड़-छाड़ की जाए? यदि वह अपने घर पर खपरैल की छत डालता है? हिंदू का उससे क्या बिगड़ता है? अस्पृश्य को क्यों पीड़ा पहुंचाई जाए, यदि वह अपने बच्चों को स्कूल भेजना चाहता है? उससे हिंदू की क्या हानि होती है? अस्पृश्य को क्यों विवश किया जाए कि वह मृत पशुओं को उठाए, सड़ा-गला मांस खाए और घर-घर जाकर अपने भोजन के लिए गिड़गिड़ाए? हिंदुओं को क्या घाटा होता है, यदि वह इन कामों को न करे? हिंदू को क्यों आपत्ति करनी चाहिए, यदि अस्पृश्य अपना धर्म बदलना चाहता है? उसके धर्म-परिवर्तन से हिंदू क्यों नाराज हों और बौखलाएं? हिंदू स्वयं को क्यों अपमानित अनुभव करें, यदि अस्पृश्य अपना सुंदर एवं सम्माननीय नामकरण करता है? किसी अस्पृश्य का उत्तम नाम हिंदू पर प्रतिकूल प्रभाव कैसे डाल सकता है? हिंदू को क्यों आपत्ति करनी चाहिए, यदि कोई अस्पृश्य अपने घर का द्वार मुख्य सड़क की ओर खोलता है? उससे उसका क्या बनता-बिगड़ता है? हिंदू को क्यों आपत्ति करनी चाहिए, यदि किन्हीं निश्चित दिवसों पर उसके कानों तक किसी अस्पृश्य की आवाज पहुंचती है? उससे वह बहरा तो