170 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
नहीं हो सकता। हिंदू को क्यों अप्रसन्नता व्यक्त करनी चाहिए, यदि कोई अस्पृश्य कोई काम करता है, प्राधिकार वाला कोई पद प्राप्त कर लेता है, भूमि खरीद लेता है, व्यापार करता है, आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो जाता है और उसकी गिनती खाते-पीते लोगों में होने लगती है? सभी हिंदू, चाहे सरकारी हों या गैर-सरकारी, मिलकर अस्पृश्यों का दमन क्यों करते हैं? सभी जातियां, चाहे वे आपस में लड़ती-झगड़ती रहें, हिंदू धर्म की आड़ में एकजुट होकर क्यों साजिश करती हैं, और अस्पृश्यों को असहाय स्थिति में रखती हैं।
निश्चय की यह सब परी लोक की कथा-सी लगती है। लेकिन जिसने पिछले अध्याय में वर्णित हिंदुओं के अत्याचार की कथाओं को पढ़ा है, उसे मालू होगा कि यह निंदनीय प्रश्न तथ्यों पर आधारित हैं। निश्चय ही तथ्य काल्पनिक कथ्य से भी अद्भुत होता है। लेकिन सबसे मजेदार बात यह है कि ये सब कारनामें वे हिंदू करते हैं, जो सामान्यतः भीरु होते हैं, यहां तक कि उन्हें कायर भी कहा जाता है। सामान्यतः हिंदू अति विनम्र लोग होते हैं। उनमें मुस्लिमों जैसी उग्रता अथवा कटुता नहीं होती। लेकिन जब हिंदू जैसे अति विनम्र लोग बेशर्मी और निर्ममता से आगजनी, लूटमार और हिंसा का सहारा लेकर पुरुषों, महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार करने लगते हैं, तो यह विश्वास करना पड़ता है कि निश्चय ही कोई ऐसा बाध्यकारी कारण होगा, जो अस्पृश्यों के इस विद्रोह को देखने पर हिंदुओं को पागल बना देता है और वे ऐसी अराजकता पर उतारू हो जाते हैं।
निश्चय ही ऐसे विचित्र और अमानवीय व्यवहार का कोई स्पष्टीकरण तो होना चाहिए। वह क्या है?
यदि आप किसी हिंदू से पूछंगे कि वह ऐसा बर्बर व्यवहार क्यों करता है, क्यों वह घोर अपमान अनुभव करता है जब अस्पृश्य स्वच्छ और सम्मानजनक जीवन जीने का प्रयास करते हैं, तो उसका उत्तर सीधा-सा होगा। वह कहेगा, ‘अस्पृश्यों के जिस प्रयास को आप सुधार कहते हैं, वह सुधार नहीं है। वह हमारे धर्म का घोर अपमान है।’ यदि आप उससे फिर पूछेंगे कि इस धर्म की व्यवस्था कहां है तो पुनः उसका उत्तर एकदम सीधा-सा होगा, ‘हमारा धर्म हमारे शास्त्रों में है।’ हिंदू, पूर्वाग्रह-रहित व्यक्ति की दृष्टि से, अस्पृश्यों के उस न्यायोचित विद्रोह का दमन कर रहा है, जो वे हिंसा, लूटमार, आगजनी पर आधारित मूलतः अन्यायपूर्ण प्रणाली के विरुद्ध कर रहे हैं। आधुनिक व्यक्ति को लगता है कि दमन का सहारा लेकर हिंदू नितांत धर्म-विरोधी कार्य कर रहा है या हिंदुओं की प्रचलित शब्दावली में कहा जाए जो वह ‘अधर्म’ का रहा है। लेकिन हिंदू इसे कदापि स्वीकार नहीं करेगा। हिंदू का विचार है कि ‘धर्म’ का उल्लंघन तो अस्पृश्य कर रहे हैं और अराजकता के उसके कर्म तो अधर्म से