9. उनकी कामनाएं हमारे लिए कानून हैं - Page 186

उनकी कामनाएं हमारे लिए कानून हैं

171

लगते हैं। उनकी प्रेरणा उसे धर्म के पुनरुद्धार हेतु उसके पावन कर्तव्य से मिलती है। यह एक ऐसा उत्तर है जिसकी सत्यता को वे लोग नहीं नकार सकते, जो हिंदुओं की मानसिकता से परिचित हैं। लेकिन इससे एक और प्रश्न उत्पन्न होता है कि वे धर्म क्या है, जिनकी व्यवस्था शास्त्रों ने की है और उनमें सामाजिक संबंधों के बारे में क्या नियम निर्धारित किए गए हैं।

II

‘धर्म’ शब्द संस्कृत भाषा से उपजा है। यह भी उन संस्कृत शब्दों में से एक है, जो किसी निश्चित परिभाषा के सभी प्रयासों का उल्लंघन करते हैं। प्राचीन-काल में इस शब्द का उपयोग विभिन्न अर्थों में होता था, भले ही वे समानार्थी लगते थे। यह देखना रुचिकर होगा कि किस प्रकार ‘धर्म’ शब्द अर्थ-संक्रमणों ख्1, से होकर गुजरा है। लेकिन यह उसके लिए उपयुक्त अवसर नहीं है। इतना कहन पर्याप्त होगा कि शीघ्र ही ‘धर्म’ ने एक निश्चित अर्थ धारण कर लिया और उसके अर्थ के बारे में कोई संशय नहीं रह गया। ‘धर्म’ शब्द का अर्थ है, हिंदू समाज के सदस्य के रूप में, किसी एक जाति के सदस्य के रूप में, और जीवन की किसी विशिष्ट अवस्था में व्यक्ति के रूप में किसी व्यक्ति के विशेषाधिकार, कर्तव्य तथा दायित्व और उसके आचरण का स्तर।

सभी हिंदू मानते हैं कि धर्म के प्रमुख स्रोत हैं - वेद, स्मृति और रीति-रिवाज। लेकिन जहां तक धर्म का संबंध है, वेदों तथा स्मृतियों में एक अंतर है। धर्म के जिन विकसित नियमों को हम देखते हैं, निश्चय ही उनके मूलाधार वेदों में हैं। अतः यह कहना उचित है कि वेद धर्म के स्रोत हैं। लेकिन वेद नहीं कहते कि वे धर्म पर औपचारिक ग्रंथ हैं। धर्म के मामलों पर उनमें सिलसिलेवार निश्यचात्मक विधियां (आदेश) नहीं हैं। धर्म संबंधी कतिपय मामलों के बारे में उनमें केवल असंबद्ध उदगार हैं। दूसरी ओर, स्मृतियां धर्म के बारे में औपचारिक ग्रंथ हैं। धर्म के बारे में उनमें कानून हैं। कानून के सही अर्थ में उन्होंने धर्म के कानून का रूप धारण किया है। यदि इस बारे में कोई विवाद हो कि क्या धर्म है और क्या अधर्म है, तो उसका फैसला स्मृति में दिए गए नियम के पाठ के संदर्भ मे ही किया जा सकता है। अतः हिंदू जिसे धर्म कहते हैं, उसका वास्तविक स्रोत स्मृतियां हैं। चूंकि धर्म और अधर्म का निर्णय करने में उन्हें प्रमाण माना जाता है, अतः स्मृतियों को धर्म के नियम निर्धारित करने वाले धर्म-शास्त्रों की संज्ञा दी गई है।

प्राचीन-काल से परंपरा से जो स्मृतियां चली आ रही हैं, उनकी संख्या के बारे में अलग-अलग अनुमान हैं। इनकी कम-से-कम संख्या पांच है और अधिक से अधिक

  1. देखिए, पी.वी. काणे, हिस्ट्री ऑफ धर्म-शास्त्र, पृ. 1-2