9. उनकी कामनाएं हमारे लिए कानून हैं - Page 187

172 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

एक सौ। ध्यान देने योग्य महत्व की बात यह है कि जहां तक प्रमाण का संबंध है, ये सभी स्मृतियां समान नहीं हैं। उनमें से अधिकांश अस्पष्ट हैं। उनमें से केवल कुछ को इतना प्रामाणिक समझा गयाकि उन पर लेखक भाष्य एवं टीकाएं लिख सकें। यदि किसी स्मृति के महत्व को इस कसौटी पर परखा जाए कि उसका भाष्य किया गया है या नहीं, तो उसके आधार पर जिन स्मृतियों को उच्च स्तरीय और प्रामाणिक कहा जा सकेगा, वे हैं, ‘मनुस्मृति’, ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ और ‘नारद स्मृति’। इन स्मृतियों में ‘मनुस्मृति’ का स्थाना सर्वोपरि है। वह उत्कृष्ट रूप में संपूर्ण धर्म का स्रोत है।

यदि यह जानना है कि वह कौन-सा धर्म है जिसके लिए हिंदू अस्पृश्यों से लड़ने-मरने के लिए तैयार हो जाता है, तो हमें स्मृतियों के नियमों को, खासकर ‘मनुस्मृति’ के नियमों की जानकारी हासिल करनी ही होगी। इन नियमों के कुछ ज्ञान के बिना अस्पृश्यों के विद्रोह के प्रति हिंदुओं की प्रतिक्रिया को समझना संभव नहीं होगा। अपने प्रयोजन के लिए यह जरूरी नहीं है कि हम स्मृतियों में वर्णित धर्म के समूचे क्षेत्र की छानबीन उसकी सभी शाखाओं-प्रशाखाओं सहित करें। धर्म की उस शाखा को जान लेना काफी होगा, जिसे आधुनिक शब्दावली में स्वीय विधि (पर्सनल ला) कहा जाता है या आम भाषा में कहें तो धर्म का वह अंग जिसका संबंध हैसियत पर आधारित अधिकार, कर्तव्य या क्षमता से है।

अतः मैं नीचे ‘मनुस्मृति’ से कुछ जरूरी मूलपाठों का उद्धरण देना चाहूंगा। उनसे भली-भांति पता चल जाएगा कि मनु ने कैसे समाज-संगठन को मान्यता दी है और अपनी समाज-व्यवस्था में शामिल विभिन्न वर्गों के लिए क्या-क्या अधिकार तथा कर्तव्य निर्धारित किए हैं।

‘मनुस्मृति’ में वर्णित समाज-व्यवस्था को समुचित रूप से नहीं आंका गया है। अतः सावधान कर देना जरूरी हे, ताकि गलतफहमी की गुंजाइश न रहे। आम तौर पर कहा भी और माना भी जाता है कि मनु ने चातुर्वर्ण्य नामक समाज-व्यवस्था निर्धारित की है। चातुर्वर्ण्य उस समाज-व्यवस्था का तकनीकी नाम है, जिनमें सभी व्यक्तियों को चार अलग-अलग वर्णों में बांटा गया है। अनेक लोगों की यह धारणा है कि मनु द्वारा निर्धारित धर्म में बस इतनी ही व्यवस्था की गई है। यह एक गंभीर भूल है। यदि इसे ठीक न किया जाए तो निश्चय ही इससे उस बारे में गंभीर गलतफहमी पैदा हो सकती है, जिसे मनु ने वस्तुतः निर्धारित किया है और जो मनु विचार में आदर्श समाज-व्यवस्था है।

मेरे विचार में यह मनु के बारे में नितांत गलत आकलन है। यह स्वीकार करना होगा कि चातुर्वर्ण्य में शामिल चार वर्णों में समाज के विभाजन को मनु ने प्रमुखता नहीं दी है। एक दृष्टि से मनु ने इस विभाजन को गौण माना है। उसकी दृष्टि में यह