9. उनकी कामनाएं हमारे लिए कानून हैं - Page 188

उनकी कामनाएं हमारे लिए कानून हैं

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केवल उन लोगों के बीच ‘आपसी’ व्यवस्था है, जिसे चातुर्वर्ण्य में शामिल किया गया है। अनेक लोगों की दृष्टि में मुख्य बात यह नहीं है कि कोई व्यक्ति ब्राह्मण है या क्षत्रिय, वैश्य है अथवा शूद्र। वह विभाजन तो उनसे पूर्व भी मौजूद था। मनु ने तो इस विभाजन का विस्तार किया है, उसे सुदृढ़ किया और उसका स्तरीकरण किया। विभाजन का सूत्रपात उसने नहीं किया। लेकिन मनु ने एक नए विभाजन का सूत्रपात अवश्य किया। वह विभाजन उन लोगों के बीच है - (1) जो चातुर्वर्ण्य की परिधि में हैं, और (2) जो चातुर्वर्ण्य की परिधि के बाहर हैं। यह नया समाज-विभाजन मनु की मौलिकता है। हिंदुओं के प्राचीन धर्म में यह उसकी अभिवृद्धि है। मनु की दृष्टि में यह विभाजन बुनियादी है, क्योंकि पहले उसने ही इसे लागू किया और अपने अधिकार के ठप्पे से उसे मान्यता प्रदान की।

अतः इस विषय से संबद्ध मूलपाठों के दो शीषर्क के अधीन रखना ही होगा - (1) उन लोगों से संबद्ध मूलपाठ जो चातुर्वर्ण्य की परिधि में हैं, और (2) उन लोगों से संबद्ध मूलपाठ जो चातुर्वर्ण्य की परिधि में नहीं हैं।

I. वे जो चातुर्वर्ण्य की परिधि में हैं - उनकी उत्पत्ति और कर्म

  1. यह ब्रह्मांड तम पुंज के रूप में, अज्ञात, लक्षणहीन, प्रमाणदि तर्कों से परे, अज्ञेय, पूर्ण निमज्जित था, जैसे प्रगाढ़ निद्रा में हो µ (मनुस्मृति, 1.5)

  2. तब स्वयंभू जो अगम थे किंतु आकाशदि महाभूतों को प्रकट करते हुए गोचर रूप में दुर्दम्य सृजनशक्ति सहित हो, अंधकार को दूर करते हुए प्रकट हुए µ (वही, 1.5)

  3. तीनों लोकों की संवृद्धि के लिए ब्रह्मा ने अपने मुख, बाहु, जंघा और चरणों से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की सृष्टि की µ (वही, 1.31)

  4. महातेजस्वी ब्रह्मा ने संपूर्ण सृष्टि की रक्षा के लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के अलग-अलग (कर्म और) व्यवसाय निर्धारित किए µ (वही, 1.87)

  5. ब्राह्मणों के लिए उन्होंने (वेदों) को पढ़ना और पढ़ाना, अपने तथा दूसरों के हित के लिए यज्ञ करना और कराना, दान लेन और दान देना, कर्म निर्धारित किए µ (वही, 1.88)

  6. उन्होंने प्रजा की रक्षा करना, दान देना, यज्ञ करना, वेदों का अध्ययन करना, विषयों में आसक्ति न रखना, क्षत्रियों के कर्तव्य बताए हैं µ (वही, 1.89)

  7. उन्होंने पशुपालन, दान देना, यज्ञ करना, (वेद) पढ़ना, व्यापार करना, ट्टण देना और खेती करना, ये वैश्यों के कर्तव्य बताए µ (वही, 1.90)