उनकी कामनाएं हमारे लिए कानून हैं
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- उन्हें सुबह सात बजे से शाम के छह बजे तक मिरासदारों के अधीन कुली
के रूप में काम करना ही होगा और उसके लिए मर्दों को चार आने प्रतिदिन
और औरतों को दो आने प्रतिदिन मजदूरी दी जाएगी,
- उक्त जातियां अपने विवाह आदि के अवसर पर भारतीय संगीत
(मेलम आदि) का इस्तेमाल नहीं करेंगी, और
- विवाह में थाली सूत्र बांधने से पूर्व घुड़चढ़ी की अपनी रस्म उन्हें
बंद करनी ही होगी। उन्हें शादी के जुलूस में पालकी के रूप में अपने घरों के
दरवाजों को ही इस्तेमाल करना होगा। किसी भी प्रयोजन के लिए वे वाहन का
इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे।
रामनाड के हिंदुओं द्वारा अस्पृश्यों पर लागू किए गए इन प्रतिबंधों की तुलना उन प्रतिबंधों से कीजिए, जिन्हें इस अध्याय में ‘मनुस्मृति’ के मूलपाठों से उद्धृत किया जा चुका है।
‘बाह्य’ के लिए मनु की व्यवस्थाओं और 1931 में कल्लारों द्वारा अस्पृश्यों पर थोपी गई शर्तों में क्या कोई अंतर है? इस प्रमाण के बाद कोई संदेह नहीं रह जाता कि अहिंदू को जो अधर्म प्रतीत होता है, वही कर्म हिंदू कर रहा है और उसके बावजूद वह अस्पृश्य से कह रहा है कि वह मनु द्वारा प्रतिपादित धर्म का पालन करे।
एक अन्य उदाहरण मध्य भारत के बलाइयों का है। बलाई लोग अस्पृश्य जाति के हैं। 1927 के आसपास बलाइयों ने अपनी जाति के सामाजिक सुधार का अभियान चलाया था और उसके बारे में नियम बनाए थे। नियमों में कहा गया था कि उनकी जाति के लोग कतिपय प्रकार के घटिया काम न करें और निश्चित प्रकार के वस्त्र धारण करें। इन नियमों से सवर्ण हिंदुओं के हितों पर कोई कुप्रभाव नहीं पड़ता था। लेकिन सवर्ण हिंदुओं ने बलाइयों के इस प्रयास को अपना अपमान समझा कि वे प्रथा द्वारा निर्धारित दर्जे से ऊपर उठना चाहते हैं। सवर्ण हिंदुओं ने इसे बलाइयों की गुस्ताखी माना और उन पर घातक प्रहार करने का निश्चय किया। निम्न घटना की रिपोर्ट पत्रों में छपी थी। उसमें बताया गया है कि विद्रोही बलाइयों के साथ सवर्ण हिंदओं ने कैसा व्यवहार किया। ख्1,
हिंदुओं का अत्याचार
बलाइयों के लिए नियम
जीवन-शैली का निर्धारण
गत मई (1927) में सवर्ण हिंदुओं, अर्थात् कलोटाओं, राजपूतों और ब्राह्मणों ने,
- यह रिपोर्ट 10 फरवरी और 1 अप्रैल, 1938 के टाइम्स आफ इंडिया से उद्धृत की गई है।