180 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जिनमें कनारिया, बिछौली, हाफसी, मर्दाना गांवों के तथा इंदौर जिले के कोई 15 अन्य गांवों के पटेल और पटवारी शामिल थे, अपने-अपने गांवों के बलाइयों को सूचित किया कि यदि वे उनके बीच रहना चाहते हैं तो उन्हें निम्नलिखित नियमों का पालन करना होगाः
बलाई लोग सुनहरी जरी कि किनारी लगी पगडि़यां नहीं पहनेंगे,
वे रंगीन या बढि़या किनारी वाली धोतियां नहीं पहनेंगे,
उन्हें किसी हिंदू के निधन का संदेश मृत व्यक्ति के रिश्तेदारों तक
पहुंचाना ही होगा, भले ही वे रिश्तेदार कितनी भी दूर क्यों न रहते हों,
- हिंदुओं के सभी विवाहों में बरात के आगे और विवाह के दौरान
बलाइयों को गाने-बजाने का काम करना होगा,
- बलाई स्त्रियां चांदी और सोने के जेवर नहीं पहनेंगी, वे बढि़या लंहगा
और कुर्ता नहीं पहनेंगी,
- बलाई स्त्रियों को हिंदू घरों में दाई वगैरह का काम करना ही
होगा,
- बलाइयों को बिना किसी उजरत के सेवा करनी होगी और उसे ही
स्वीकार करना होगा जो हिंदू अपनी खुशी से दे दें, और
- यदि बलाई इन शर्तों को स्वीकार नहीं करेंगे तो उन्हें गांव छोड़ना
पड़ेगा।
बलाइयों ने नियमों का पालन नहीं किया
बलाइयों ने इन नियमों का पालन करने से इंकार कर दिया और हिंदुओं ने उनके खिलाफ कार्यवाही की। बलाइयों को गांव के कुंओं से पानी नहीं लेने दिया गया। उन्हें अपने पशु नहीं चराने दिए गए। बलाइयों को हिंदू की भूमि से होकर गुजरने नहीं दिया गया। यदि किसी बलाई के खेत के चारों ओर हिंदुओं के खेत थे तो बलाई अपने खेत पर नहीं जा सकता था। हिंदू अपने मवेशियों को हांक कर बलाइयों के खेतों में चरने के लिए भी छोड़ देते थे। बलाइयों ने इन अत्याचारों के खिलाफ ‘दरबार’ के सामने अर्जियां दीं। पर चूंकि समय पर उन्हें कोई राहत नहीं मिली और अत्याचार होता रहा, अतः सैंकड़ों बलाइयों को अपनी पत्नियों और बच्चों समेत विवश होकर उन घरों को छोड़ना पड़ा, जहां पीढि़यों से उनके पूर्वज रह रहे थे। उन्हें पड़ोसी देशी राज्यों, अर्थात् धार, देवास, भोपाल, ग्वालियर तथा अन्य राज्यों के गांवों में जाना पड़ा।