9. उनकी कामनाएं हमारे लिए कानून हैं - Page 196

उनकी कामनाएं हमारे लिए कानून हैं

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जबरन-करार

केवल कुछ दिन पूर्व इंदौर नगर से कोई सात मील उत्तर में स्थित रेवती गांव के हिंदुओं ने बलाइयों को आदेश दिया कि वे अन्य गांवों के हिंदुओं द्वारा बलाइयों के खिलाफ बनाए गए नियमों के अनुसार पक्के कागज पर लिखे करार पर दस्तखत करें। बलाइयों ने आदेश का पालन नहीं किया। कहा जाता है कि हिंदुओं ने उनमें से कुछ की पिटाई की। उन्होंने एक बलाई को खंभे से बांध दिया और उससे कहा कि यदि वह करार पर दस्तखत करने के लिए राजी हो जाए तो उसे छोड़ दिया जाएगा। उसने करार पर दस्तखत कर दिए और उसे छोड़ दिया गया। इसे गांव के कुछ बलाई भागकर अगले दिन, यानी 20 दिसंबर को प्रधानमंत्री के पास पहुंचे और उनसे शिकायत की कि रेवती गांव के हिंदुओं ने उनके साथ कैसा दुर्व्यवहार किया। उन्हें जिले के सुबहा के पास भेज दिया गया। इस अधिकारी ने पुलिस की मदद से गांव में जांच की और सिफारिश की कि हिंदुओं के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 342 और 147 के अधीन और बलाइयों के खिलाफ धारा 147 के अधीन कार्रवाई की जाए।

बलाई गांवों को छोड़कर चले गए

जातीय अत्याचार

कानून की जानकारी न होना एक असुविधा

बलाइयों के प्रति कतिपय गांवों के हिंदू निवायिं के व्यवहार में कोई सुधार नहीं हुआ है। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, सवर्ण हिंदुओं ने बलाइयों के साथ दुर्व्यवहार किया है। इंदौर जिले में अकेले दोपालपुर परगने से ही बलाइयों को काफी संख्या में अपने घर छोड़ने पड़े और पड़ोस के राज्यों में शरण लेनी पड़ी। विवश होकर जिन गांवों को बलाई छोड़कर चले गए, वे हैं µ बदौली, अहिरखराल, पिपलोदा, मोरखेर, पमालपुर, करोदा, छतवाडा, नेवरी, पान, सनौड़ा, अज्नोटी, खेतड़ी और सनावडा। पमालपुर गांव में तो एक भी बलाई पुरुष, स्त्री या बच्चा नहीं रहा है। कहा जाता है कि उक्त गांवों में से एक निवासी नंदा बलाई को गांव के हिंदुओं ने बुरी तरह मारा-पीटा। समाचार है कि एक गांव में तो हिंदुओं ने बलाइयों के सभी घरों को जलाकर खाक कर दिया, लेकिन अपराधियों का अभी तक कोई सुराग नहीं मिला है।

बलाई भोले-भाले अनपढ़ ग्रामीण होते हैं। उन्हें कानूनी कार्रवाई की कोई जानकारी नहीं होती। वे तो सोचते हैं कि सरकार के पास अर्जी भेज दो, बस उनका काम बन जाएगा। शिकायत का आखिर तक कैसे पीछा किया जाए, इसका