9. उनकी कामनाएं हमारे लिए कानून हैं - Page 197

182 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उन्हें न जो ज्ञान है और न ही उनके पास इसके लिए कोई साधन है। कहा जाता

है कि कुछ मामलों में चूंकि उन्होंने अपने आरोपों के समर्थन में गवाह पेश नहीं

किए, अतः मजिस्ट्रेट के पास उनकी शिकायत को खारिज करने के अलावा और

कोई चारा नहीं था।

धर्म और अधर्म के इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो क्या इस बारे में कोई संदेह रह जाता है कि अस्पृश्यों के विद्रोह के दमन के लिए हिंदू जिस अराजकता और बर्बरता का सहारा लेते हैं, उसके पीछे यह प्ररेणा है कि वे तो अपने पर हुए घोर अत्याचार को रोकने का पुण्य कार्य कर रहे हैं।

IV

यह प्रश्न नितांत प्रासंगिक है कि आज मनु के इस धर्म का कितना अंश बाकी रह गया है? यह स्वीकार करना ही होगा कि कानून के रूप में, उन नियमों के रूप में जो किसी न्यायालय के लिए विवादों के निर्णय के लिए बाध्यकारी होते हैं, मनु के धर्म की कोई प्रवर्तन-शक्ति नहीं रही है। अपवाद विवाह, उत्तराधिकार आदि जैसे मामले हैं, जिनका प्रभाव केवल व्यक्ति पर पड़ता है। सामाजिक आचरण तथा नागरिक अधिकारों को नियमित करने वाले कानून के रूप में उसे लागू नहीं किया जा सकता। लेकिन भले ही कानून के रूप में उसकी मान्यता नहीं रही है, प्रथा के रूप में वह अब भी विद्यमान है।

कानून के मुकाबले प्रथा भी कोई नगण्य चीज नहीं है। यह सच है कि कानून को राज्य अपने पुलिस बले के माध्यम से लागू करता है और प्रथा यदि वैध नहीं है, तो उसे राज्य लागू नहीं कर सकता। लेकिन व्यवहार में इस अंतर का कोई महत्व नहीं है। राज्य जितने पुरअसर ढंग से कानून को लागू करता है, उससे भी कहीं पुरअसर ढंग से प्रथा को जनसमूह लागू करता है। इसका कारण यह है कि संगठित जनसमूह की बाध्यकारी शक्ति राज्य की बाध्यकारी शक्ति से कहीं अधिक प्रबल होती है।

मनु का धर्म तकनीकी दृष्टि से कानून नहीं रहा है, फिर भी इस कारण उसकी प्रवर्तनीयता पर कोई आंच नहीं आई है। लेकिन ऐसी परिस्थितियां हैं, जो मनु के इस धर्म के प्रभाव को पूरा करने में सक्षम हैं।

इन परिस्थितियों में सर्वोपरि है, प्रथा का बल। समाज के हर समूह की न केवल कार्य करने की, अपितु अनुभव और विश्वास करने की, आकलन करने की तथा स्वीकार और अस्वीकार करने की कुछ (आदतें) होती हैं। वे समूह की मानसिक वृत्तियों का अंग होती हैं। हर नवांगतुक, चाहे वह समूह में जन्म से या अंगीकरण से