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उनकी कामनाएं हमारे लिए कानून हैं

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शामिल होता है, इस सामाजिक माध्यम की दीक्षा प्राप्त करता है। हर समूह के भीतर यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है कि समूह की इन मानसिक वृत्तियों को समूह के हर नए सदस्य के मानस पर गोदा जाए। उसके द्वारा समूह व्यक्ति का समाजीकरण करता है या नवागंतुक की मानसिक तथा व्यावहारिक वृत्तियों का निरूपण करता है। वह समूह पर आश्रित हो जाता है। अतः वह समूह की मानसिक वृत्तियों को उसी प्रकार अस्वीकार नहीं कर सकता, जिस प्रकार वह अपने भौतिक पर्यावरण की स्थिति और विनियमन को अस्वीकार नहीं कर सकता। वस्तुतः वह समूह पर इतना आश्रित हो जाता है कि तुरंत पंक्ति में खड़ा हो जाता है और समूह में प्रचलित श्रद्धा और व्यवहार के तौर-तरीकों को स्वीकार कर लेता है। वे उसके अपने मानस की स्थाई वृत्ति बन जाते हैं।

समूह व्यक्ति का किस प्रकार समाजीकरण करता है, इसका सविस्तार वर्णन ग्रोटे ख्1, ने किया है। वह कहते हैंः

क्या सत्य अथवा असत्य है, संभव अथवा असंभव है, उचित या अनुचित है,

पवित्र अथवा अपवित्र है, सम्माननीय या अवमाननीय है, श्रद्धेय अथवा अश्रद्धेय

है, शुद्ध अथवा अशुद्ध है, सुंदर अथवा असुंदर है, श्लील अथवा अश्लील है,

बाध्यकारी या अबाध्यकारी है, इसके प्रति विश्वास संबंधी आस्थाओं और प्रवृत्तियों

का तथा नैतिक, धार्मिक, सौंदर्यात्मक और सामाजिक श्रद्धा का समाज में हर

व्यक्ति के दर्जे तथा संबंधों के प्रति और मनोरंजन के मान्य तौर-तरीकों के प्रति

सम्मान का जो यह समूचा संगम है, वह एक सुस्थापित तथ्य तथा परिस्थिति

है। इसका वास्तविक उद्गम अधिकांशतः अज्ञात है, लेकिन समूह का हर नया

सदस्य इस पर जन्म और व्यवहार से आश्रित है। ... वह हर व्यक्ति की प्रकृति

का अंग बन जाता है, उसके मानस की स्थाई वृत्ति अथवा मानसिक प्रवृत्तियों

का निर्धारित समूह बन जाता है। उसी के अनुसार अनुभव विशेष का आकलन

और व्यक्ति विशेष का मूल्यांकन वह करता है। ... समुदाय उस व्यक्ति से

घृणा, द्वेष और उसका तिरस्कार करता है, जो अपने समाज के धर्ममत से असहमति

प्रकट करता है।... उनकी घृणा भी अलग-अलग रूपों में उजागर होती है... उसकी

पराकाष्ठा, सहिष्णुता, सद्भाव और सम्मान का वह अपवंचन है, जो व्यक्ति के

जीवन को दूभर बना देता है।

लेकिन वह क्या है, जिसके फलस्वरूप यह स्थिति आती है? ग्रोटे ने स्वयं इस प्रश्न का उत्तर दिया है। उनका उत्तर है कि इसका कारण है, ‘नोमोस (नियम तथा

  1. ग्रोटे, प्लेटो एंड दि अदर कंपेनियन्स ऑफ सीकरेट्स, खंड I, पृ. 249