9. उनकी कामनाएं हमारे लिए कानून हैं - Page 199

184 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

प्रथा) सबका राजा (इसे हेरोडोटस ने पिंडार से उद्धृत किया है), व्यक्ति के मानस पर राज करने वाली यह लौकिक और अलौकिक पूर्ण प्रभुत्व वाली सत्ता है जो स्थानीय सांचे के अनुसार बुद्धि तथा भावनाओं को ढालती है और सहज एवं स्वाभाविक प्रवृत्तियों का मुखौटा धारण करके राज करती है।’

इस सबका निष्कर्ष यह है कि जब किसी समुदाय के भीतर कर्म, अनुभव, आस्था, आकलन, स्वीकृति अथवा अस्वीकृति के तौर-तरीके छन-छनकर प्रथा और परंपरा का रूप धारण कर लेते हैं तो उन्हें लागू करने के लिए कानून की मान्यता की आवश्यकता नहीं रह जाती है। समूह सदैव सामूहिक कार्यवाही द्वारा पूर्णाधिकारों का अंबार खड़ा कर सकता है और देख सकता है कि उनका उल्लंघन न होने पाए।

मनु की धर्म-व्यवस्था पर भी यही बात लागू होती है। सदी-दर-सदी मनु के धर्म में यह विनियम शक्ति चली आ रही है, अतः वह हिंदुओं की प्रथाओं और परंपराओं का अभिन्न अंग और अनिवार्य अंग बन गया है। वह हिंदुओं के रक्त में समा गया है और उसने उनके जीवन के रक्त को विशिष्टता प्रदान की है। कानून के रूप में उसने हिंदुओं के कर्मों पर नियंत्रण किया। भले ही वह अब प्रथा मात्र है, पर आज भी उसका कम महत्व नहीं है। वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसके चरित्र को ढालता है और उसके दृष्टिकोण की दिशा को निर्धारित करता है।

एक और बात है, जो मनु के धर्म को समाप्त नहीं होने देती। वह यह है कि कानून उसके प्रचार-प्रसार को नहीं रोकता। यह एक ऐसी परिस्थिति है, जो संभवतः अनेक लोगों के जहन में नहीं उतरने पाती। यह कहा जाता है कि ब्रिटिश राज की एक देन यह ह कि ‘मनुस्मृति’ अब इस देश का कानून नहीं रह गई है। इसमें संदेह नहीं कि यह एक महान देन है कि अदालतों से अब यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वे ‘मनुस्मृति’ के उपबंधों को कानून के नियमों के रूप में लागू करें। इस बात को तो वे भुक्तभोगी ही अच्छी तरह से समझ सकते हैं, जो इस ‘घिनौनी’ चक्की के पाटों के नीचे पिसे हैं। यह अस्पृश्यों के लिए उतना ही महान वरदान है, जितना कि यूरोपवासियों के लिए धर्म-सुधार था। लेकिन साथ ही यह भी याद रखना होगा कि धर्म-सुधार का स्थाई लाभ न होता, यदि उसके बाद ‘प्रोटेस्टैंट क्रांति’ न होती। मेरे विचार में प्रौटेस्टैंट क्रांति की विशिष्टताएं इस प्रकार हैंः (1) राज्य सर्वोपरि है और चर्च राज्य के अधीन है, (2) जिस सिद्धांत का प्रचार कराना हो, उसका अनुमोदन राज्य से कराया जाए, और (3) पादरी राज्य के ही सेवक होंगे और वे न केवल उन अपराधों के लिए दंड के भागी होंगे जो देश के सामान्य कानून के विरुद्ध करेंगे, बल्कि उनके लिए भी जिनमें नैतिक दुराचार शामिल होगा। वे दंड के भागी होंगे, यदि वे राज्य के अनुमोदन के बिना सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार करेंगे। व्यक्तिगत रूप से मैं ‘राज्य द्वारा मान्य’ चर्च का पक्षधर हूं। यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके