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उनकी कामनाएं हमारे लिए कानून हैं 185

अधीन यह सुरक्षा और संरक्षण है कि धर्म के सिद्धांतो के नाम पर कोई भी व्यक्ति अनुचित और घिनौने सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार नहीं कर सकता। मैं जानता हूं कि ऐसे लोग हैं, जो राज्य द्वारा मान्य चर्च की व्यवस्था का विरोध करते हैं। लेकिन चाहे यह व्यवस्था अच्छी हो या बुरी, तथ्य यह है कि मनु द्वारा निर्धारित धर्म के प्रचार-प्रसार पर कोई कानूनी रोक नहीं है। न्यायालय उसे कानून नहीं मानते। लेकिन कानून उसे कानून के प्रतिकूल भी तो नहीं मानता। वस्तुतः हर गांव में रोज यही होता है। जब पंडित इस धर्म का उपदेश माता-पिता को और माता-पिता उसका उपदेश अपने बच्चों को देते हैं, तो ‘मनुस्मृति’ कैसे समाप्त हो सकती है? उसके पाठों की जड़ों को रोज सींचा जाता है और हर-एक को यह याद कराया जाता है के अस्पृश्यता उनके धर्म का अंग है।

मनु के धर्म के इस दैनिक प्रचार-प्रसार की विषैली छूत, पुरुष हो या स्त्री, बच्चा हो या बूढ़ा सबके मानस में घुस गई है। यह न्यायाधीशों के मानस में भी घुस गई है। कलकत्ता का एक समाचार ख्1, है। नौबिन नामक एक डोम (अस्पृश्य) पर बकरी की चोरी करने के इल्जाम में मुकदमा चलाया गया। उसका दोष सिद्ध नहीं हुआ। उसने वादी के खिलाफ मानहानि के लिए फरियाद की। मजिस्ट्रेट ने उसकी फरियाद को इस आधार पर खारिज कर दिया कि वह तो निम्न जाति का है, उसका कोई मान है ही नहीं। इस पर उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा। उसने मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि उसका दृष्टिकोण गलत है और दंड प्रक्रिया के अधीन सभी व्यक्ति समान हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि मजिस्ट्रेट को कहां से यह भान हुआ कि अस्पृश्य का कोई मान नहीं होता? निश्चय ही ‘मनुस्मृति’ के उपदेश से।

मनु का धर्म तो कभी पुराना या बासी हुआ ही नहीं। वह तो इतना ताजा है कि जैसे उसे आज ही बनाया गया हो। लक्षण तो ऐसे हैं, जैसे भविष्य में भी उसका वर्चस्व बना रहेगा। प्रश्न केवल इतना है कि वह वर्चस्व अस्थाई होगा या चिरस्थाई?

  1. डब्ल्यू.आर. (सीआर.) 35, सम्राज्ञी बनाम नोबिन डोम