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श्री गांधी की छत्रछाया में
कांग्रेस के माध्यम से उनका कार्य
I. विचित्र स्वागत,
II. महान खंडन,
III. आरोप-पत्र,
IV. आरोप-पत्र का आधार,
V. गांधी की त्रासदी, और
VI. भारत और अस्पृश्यों को उनकी देन।
श्री गांधी 28 दिसंबर, 1931 को लंदन से भारत लौटे। लंदन वह भारतीय गोलमेज सम्मेलन के दूसरे सत्र में प्रतिनिधि के रूप में भाग लेने के लिए गए थे। गोलमेज सम्मेलन में वह व्यक्ति और राजनेता, दोनों ही रूपों में नितांत विफल रहे और अपयश के भागी बने थे। मुझे पता है कि हिंदू लोग मेरी राय से सहमत नहीं होंगे। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह है कि इस संबंध में मेरी राय श्री गांधी के परम मित्र की राय से मेल खाती है। मैं दो सज्जनों की रायों का हवाला दूंगा। श्री एवर गोलमेज सम्मेलन के दौरान श्री गांधी के निकट सहयोगी रहे थे। उन्होंने लंदन के गोलमेज सम्मेलन में श्री गांधी की भूमिका के बारे में इस प्रकार लिखा है ख्1, ः
सेंट जेम्स पैलेस में गांधी ने उन लोगों की मूर्खतापूर्ण आशा पर पानी फेर
दिया, जिनकी नजर में वह सम्मेलन में महापुरुष की भांति पैर पसार कर बैठे
हुए थे ... वह हतप्रभ हो गए थे।
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- गांधी इन लंडन µ एशिया, फरवरी 1952