188 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उनका प्रथम भाषण निष्प्रभावी रहा। उसमें भावनात्मक अपील थी। उसमें
जरूरत से ज्यादा विनम्रता थी और उसमें करोड़ों पीडि़त लोगों की अनन्य चिंता
का राग अलावा गया था। किसी ने भी उसकी सच्चाई पर अंगुली नहीं उठाई।
लेकिन उसकी आवाज खरे सिक्के जैसी नहीं थी। संभवतः वह सही बात थी,
पर गलत जगह पर कही गई थ्ी। न ही समग्र रूप से उनके बाद के हस्तक्षेप
अधिक सफल रहे। उनकी यह कुछ शिकवाभरी शिकायत थी कि ब्रिटिश
सरकार ने नए भारतीय संविधान के लिए कोई योजना प्रस्तुत नहीं की। उससे
तो गांधी के कुछ सहयोगी ही मर्माहत हुए। उन्हें कदापि यह आशा नहीं थी कि
राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रतिनिधि ब्रिटिश मंत्रियों के आगे मार्गदर्शन और पहलकदमी
के लिए गिड़गिड़ाएगा। घोर आश्चर्य ! स्थिरता के लिए रुपये को पौंड से
नत्थी करने के प्रति विरोध विफल रहा। मताधिकार तथा उससे जुड़े मामलों
पर विचार-विमर्श के प्रति योगदान नगण्य रहा। पर्दे के पीछे वह हिंदू-मुस्लिम
वार्ताओं में काफी सक्रिय रहे, लेकिन वहां भी परिणाम धुंधले थे। एक पल
के लिए भी कमेटी की कार्यवाही के दौरान न तो गांधी ने अगुवाई की और
न ही कोई सार्थक प्रभाव डाला। वह वहां बैठे रहे। कभी बोले, कभी चुप रहे
और वहां काम उसी तरह चलता रहा, जैसे कि उनके बिना भी चलता।
प्रस्तुत है गोलमेज सम्मेलने में श्री गांधी की उपलब्धि के बारे में श्री बोल्टन का कथनः ‘कूटनीतिज्ञ और राजनेता के रूप में श्री गांधी का क्या योगदान रहा?’
गोलमेज सम्मेलन के प्रथम सत्र के समापन पर तीन प्रश्न तय नहीं सके थे। जो तीन प्रमुख प्रश्न विवाद का विषय बने, वे थे µ अल्पसंख्यकों का प्रश्न, संघात्मक ढांचे का प्रश्न और साम्राज्य में भारत के दर्जे का प्रश्न। उनको हल करने के लिए भारी कूटनीतिज्ञ सूझबूझ की जरूरत थी। बहुतेरों ने कहा कि उन प्रश्नों का निपटारा नहीं हो सका, क्योंकि गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस की बुद्धिमत्ता और प्राधिकार का प्रतिनिधित्व नहीं हो पाया था। दूसरे सत्र में श्री गांधी आए और उन्होंने अभाव की पूर्ति की। क्या श्री गांधी ने इन अनिर्णीत समस्याओं में से किसी एक का समाधान किया? मेरे विचार में यह कहना अनुचित नहीं होगा कि श्री गांधी ने सम्मेलन में नया मतभेद पैदा कर दिया। उन्होंने हर भारतीय प्रतिनिधि की खिल्ली उड़ाने की बचकाना हरकत शुरू कर दी। उन्होंने उनकी ईमानदारी और उनके प्रतिनिधि स्वरूप पर अंगुली उठाई। उन्होंने उदारपंथियों पर छींटाकशी करते हुए कहा कि वे तो कोरे सिद्धांत बघारने वाले निष्क्रिय राजनेता हैं और उनके कोई समर्थक नहीं हैं। मुस्लिमों के बारे में उन्होंने कहा कि उनसे कहीं बेहतर प्रतिनिधि तो मुसलमानों