श्री गांधी की छत्रछाया में
189
का वह करते हैं। उन्होंने दावा किया कि दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व तो वह करते हैं, न कि दलित वर्ग के प्रतिनिधि। अपने हर भाषण के अंत में वह यही बात बार-बार दोहराते थे और उससे घृणा-सी होने लगी थी। गैर-कांग्रेसी प्रतिनिधियों को सभी ईमानदार लोगों की ओर से धन्यवाद मिलना चाहिए कि उन्होंने श्री गांधी की इस बकवास और दंभ को सहने किया। उन्होंने न केवल श्री गांधी का बचाव करने के लिए उनसे सहयोग किया, बल्कि देश को उनकी गलती से बचाया। साथी प्रतिनिधियों के प्रति इस अभद्रता के अलावा क्या श्री गांधी उस ध्येय का समर्थन कर सके, जिसकी वकालत करने के लिए वह गए थे? वह ऐसा नहीं कर सके। उनका कार्य-संचालन अपयशकारी था। विरोध और संघर्ष के स्थान पर वह उन मामलों पर घुटने टेकने लगे, जिनके बारे में उन्हें कभी भी हथियार नहीं डालने चाहिए थे। वह नरेशों के आगे झुक गए और उन्होंने उनकी यह बात स्वीकार कर ली कि संघात्मक विधान-मंडल में अपने प्रतिनिधि वे स्वयं मनोनीत करेंगे। प्रतिनिधि चुने नहीं जाएंगे, जैसे कि मांग उनके प्रजा-जनों ने की थी। वह अनुदारपंथियों के आगे झुक गए और प्रांतीय स्वायत्तता से संतुष्ट होने के लिए राजी हो गए। वह इस बात के लिए सहमत हो गए कि केंद्रीय दायित्व पर आग्रह नहीं किया जाएगा, जिसके लिए लाखों भारतीय जेल गए थे। केवल वह अल्पसंख्यकों के आगे नहीं झुके। यही वह एकमात्र पक्ष था, जिसके आगे वह झुक सकते थे और अपनी प्रतिष्ठा बढ़ा सकते थे तथा देश का भला कर सकते थे।
श्री गांधी की प्रतिष्ठा को ध्वस्त करने में सबसे अधिक योगदान गोलमेज सम्मेलन में उनकी भागीदारी ने किया। गोलमेज सम्मेलन में श्री गांधी की उपस्थिति उनके अनेक मित्रों के लिए पीड़ाजनक रही होगी। जिस भूमिका को निभाने का दायत्वि उन्होंने लिया, उसके लिए वह उपयुक्त नहीं थे। किसी भी देश ने कभी भी संविधान-रचना के लिए ऐसा प्रतिनिधि नहीं भेजा था, जिसे न तो पूरा प्रशिक्षण मिला था, और न ही उसने पूरा अध्ययन किया था। गोलमेज सम्मेलन में श्री गांधी अपनी जुबान पर संत नरसी मेहता का गीत लेकर गए। उनके और देश के लिए बेहतर तो यही होता कि वह अपने साथ तुलनात्मक संवैधानिक विधि का एक ग्रंथ ले जाते। जिस विषय का निपटारा उन्हें करना था, उसका ज्ञान उन्हें नहीं था। अतः वह इस बारे में नितांत असमर्थ और असहाय थे कि वह ब्रिटिश प्रस्तावों का खंडन कर सकें या उनके जवाब में अपने वैकल्पिक प्रस्ताव रख सकें। तो इसमें अचरज कैसा, यदि अपने भक्तों की टोली से बिछुड़े और राजनेताओं के चक्कर में फंसे श्री गांधी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए। हर मोड़