190 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पर उन्होंने गड़बड़ी की और जब देखा कि उससे भी काम नहीं चलेगा तो वह हताश होकर भारत लौट आए।
जब श्री गांधी ने भारत की धरती पर कदम रखा, तो उनका कैसा स्वागत हुआ? बाहर वालों तथा उन लोगों को जो श्री गांधी के भक्त नहीं हैं, यह प्रश्न विचित्र लग सकता है, पर तथ्य है कि जब लौयड ट्रिस्टिनों के पानी के जहाज पिल्सनर ने 28 दिसंबर, 1931 को प्रातः 8 बजे बंबई बंदरगाह में प्रवेश किया तो पुरुष, स्त्री एवं बच्चों की उल्लास भरी भीड़ ने उनका स्वागत किया। पोत-घाट पर उनकी वापसी पर उनका स्वागत करने और उनके दर्शन के लिए हजारों लोग एकत्र हो गए थे। इस स्वागत की भव्यता की विशद झांकी ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ और ‘ईवनिंग न्यूज’ के निम्न उद्धरणों से मिल जाएगीः
पिल्सनर, जहाज ने जब बंदरगाह में प्रवेश किया तो उसके साथ केसरिया
रंग की साड़ी पहने देश-सेविकाओं (कांग्रेस की स्वयं-सेविकाओं) का अनुरक्षक
दल था। वे पोत-घाट से कुछ दूरी तक छोटी नौकाओं में बैठकर गई थीं।
कांग्रेस कमेटी ने बंबई फलाइंग क्लब से अनुरोध किया था कि उसके एक-दो
विमान पिल्सनर पर उड़ान भरें और जब वह पोत-घाट के किनारे-किनारे चले,
तो उस पर वे फूलमालाओं की वर्षा करें। लेकिन फलाइंग क्लब ने बुद्धिमानी
का परिचय देते हुए यही उचित समझा कि वह राजनीति से दूर रहे। उसने
कांग्रेस के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया।
बेल्लार्ड पायर (पोत-घाट) का लंबा-चौड़ा सेंट्रल हाल कांग्रेसी झंडों और
झंडियों से सजा हुआ था। हाल के मध्य में एक विशाल मंच तैयार किया गया
था। स्थानीय तथा देहातों के विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों के लिए उसके चारों
ओर कुर्सियां बिछाई गई थीं। इन प्रतिनिधियों को प्रवेश-पत्र दिए गए थे।
पोत-घाट और नगर से स्वागत-कक्ष की ओर आने वाले दोनों मार्गों पर
पंक्तिबद्ध देश-सेविकाएं खड़ी हुई थीं। वे राष्ट्रीय झंडे लहरा रही थीं। कक्ष
के भीतर मंच की रक्षा और एकत्रित लोगों पर नियंत्रण का कार्य भी स्वयं
सेविकाओं को सौंपा गया था।
कांग्रेसी नेताओं से घिरे श्री गांधी मंच पर पहुंचे और जय-जयकार तथा
तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत किया गया। उन्होंने मंच पर अभी
कदम रखा भी नहीं था कि उनके पास तार द्वारा संदेशों (संभवतः स्वागत के)