श्री गांधी की छत्रछाया में
की बाढ़-सी आने लगी। उनका तांता-सा बंध गया।
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मंच पर खड़े-खड़े ही वहां एकत्रित सार्वजनिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों
ने उनके गले में बारी-बारी से फूलों की मालाएं अर्पित कीं। इन प्रतिनिधियों
के नाम छपी हुई एक लंबी सूची से पुकारे गए। सूची की प्रतियां पहले से
ही बांट दी गई थीं।
माल्यार्पण के साथ ही स्वागत कक्ष की कार्यवाही समाप्त हो गई।
फिर श्री गांधी के लिए जिस वाहन की व्यवस्था की गई थी, उसके साथ
चार-चार व्यक्तियों के कतार में एक जुलूस तैयार किया गया। श्री गांधी को
एक सुसज्जित मोटर कार में बैठाया गया। उनके बाईं ओर श्री वल्लभभाई
पटेल, दाईं ओर श्री विट्ठलभाई पटेल और सामने की सीट पर बंबई प्रांत की
कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष श्री के.एफ. नरीमन बैठे थे।
श्री गांधी की कार के पीछे थी एक पाइलट कार और उसके पीछे थीं
अन्य कारें, जिनमें कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्य थे। इस प्रकार जुलूस
बेल्लार्ड पायर मार्ग, हार्नबी मार्ग और कालबादेवी मार्ग से होकर गुजरा।
कांग्रेस कमेटी के अनुरोध पर इन मार्गों को नागरिकों ने भली-भांति सजाया
था। मार्ग के दोनों ओर पांच से दस-दस की कतारों में लोगों की भीड़
खड़ी थी और तालियों आदि से स्वागत कर रही थी। अंत में जुलूस ‘मनी
भुवन, गामदेवी’ पहुंचा।
पूरे स्वागत समारोह में कहीं भी श्री गांधी ने अभिवादन स्वीकार करने के लिए अपना मुंह नहीं खोला। व्रतों से बंधे इस व्यक्ति का रविवार को मौन व्रत था और उसका समय तब तक समाप्त नहीं हुआ था। न कि उन्होंने वहां एकत्रित लोगों के प्रति उस शिष्टता, सद्व्यवहार अथवा आदर की ओर कोई ध्यान दिया, जिसका तकाजा था कि वह उससे पूर्व ही अपना व्रत तोड़ देते।
कांग्रेस के आधिकारिक इतिहासकार ने श्री गांधी के इस स्वागत का वर्णन ख्1, इस प्रकार किया हैः
बंबई में भारत के सभी भागों तथा प्रांतों के लोग एकत्र हुए और उन्होंने लोकप्रिय
जन-नेता का समुचित स्वागत किया। स्टीमर पर श्री गांधी का स्वागत करने के
लिए जो मित्र पहुंचे, उनके प्रति उन्होंने बड़ी आत्मीयता प्रकट की। अनके लोगों के
उन्होंने कंधे थपथपाए, कुछ को कसकर धौल जमाई और वयोवृद्ध अब्बास तैयबजी
की दाढ़ी को उन्होंने खींचा। ‘कस्टम हाउस’ के एक कक्ष में उनका औपचारिक