192 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
स्वागत किया गया। फिर बंबई की सड़कों पर एक ऐसा जुलूस निकाला गया, जो
स्वदेश में राजाओं के लिए भी ईर्ष्या का विषय हो सकता है।
इस विवरण को पढ़कर हमें आयरलैंड के सेन फेन प्रतिनिधियों की याद आ जाती है। वे ठीक 10 वर्ष पूर्व 1921 में आयरिश स्वराज के प्रश्न के निपटारे के लिए श्री लायड जार्ज के आमंत्रण पर लंदन गए। कौन नहीं जानता कि आयरिश प्रतिनिधियों ने ब्रिटिश मंत्रिमंडल से एक संधि की थी। उस पर 8 दिसंबर, 1921 को हस्ताक्षर हुए थे। बाद में संधि सेन फेन पार्टी की संसद की ‘डेल’ (निचले सदन) के सामने अनुमोदन के लिए प्रस्तुत की गई। उसकी बैठक 14 दिसंबर, 1921 से 7 जनवरी, 1922 तक चली। 7 जनवरी को मत-विभाजन हआ। संधि के पक्ष में 64 वोट पड़े और विपक्ष में 571 और इस संधि को कराने वाले आयरिश प्रतिनिधियों का कैसा स्वागत हुआ? आर्थर ग्रिफिथ आयरिश प्रतिनिधि-मंडल के अध्यक्ष थे और माइकेल कौलिन्स उनके सर्वाधिक प्रमुख सहयोगी। संधि-विरोधी सेन फेन पार्टी के लोगों ने दोनों को गोली से उड़ा दिया। आर्थर ग्रिफिथ की 12 अगस्त को और माइकेल कौलिन्स की 22 अगस्त, 1922 को हत्या कर दी गई। उनकी इस निर्मम हत्या का कारण यह था कि संधि में अल्सटर के समावेश और आयरलैंड के लिए गणराज्य की व्यवस्था नहीं थी। यह सच है कि संधि में इसकी व्यवस्था नहीं थी। लेकिन यदि इसे ध्यान में रखा जाए कि बातचीत दोनों पक्षों के बीच इस स्पष्ट समझौते के आधार पर शुरू की गई थी कि ये दोनों प्रश्न वार्ता के दायरे से बाहर थे, तो यह स्वीकार करना होगा कि यदि संधि में उनका समावेश नहीं किया गया, तो उसमें आयरिश प्रतिनिधियों का कोई दोष नहीं था। आयरिश प्रतिनिधियों के प्रति संधि-विरोधी सेन फेन पार्टी वालों ने जो रोष और आक्रोश व्यक्त किया, उसका कोई नैतिक आधार नहीं था। आर्थर ग्रिफिथ तथा माइकेल कौलिन्स पर दुर्भाग्य की जो गाज गिरी, उसे किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।
जो भी हो, श्री गांधी के इस स्वागत को बड़ी ही अजीबोगरीब घटना माना जाएगा। दोनों ही स्वराज प्राप्ति के लिए गए। ग्रिफिथ और कोलिन्स ने आयरलैंड के लिए और श्री गांधी ने भारत के लिए प्रयास किया। ग्रिफिथ और कौलिन्स सफल हुए और उनकी लगभग जीत हुई। श्री गांधी विफल रहे और उनके हाथ लगी केवल पराजय और अपयश। फिर भी कौलिन्स और ग्रिफिथ को गोली से उड़ा दिया गया, और श्री गांधी को मिला ऐसा स्वागत कि राजा भी उनसे ईर्ष्या करने लगें। दोनों के भाग्य के बीच कैसी स्पष्ट और क्रूर विषमता? कहां कौलिन्स और ग्रिफिथ का दुर्भाग्य, और
- पट्टाभि सीतारमैया, हिस्ट्री ऑफ दि कांग्रेस, पृ. 857