10. श्री गांधी की छत्राछाया में - Page 209

194 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

तो उनका स्वागत करने के लिए एक विशाल भीड़ एकत्रित हुई। उनके एक मित्र ने उन पर भीड़ की विशालता का सिक्का जमाने का प्रयास किया। लेकिन क्रौमवेल ने बात को हंसी और व्यंग्य में उड़ाते हुए कहा, ‘हां-हां, मैं जानता हूं, बहुतेरे इस आशा से भी आएंगे कि मुझ फांसी पर झूलता हुआ देखें’ कोई कांग्रेसी नेता क्रौमवेल के यथर्थावाद को अनुभव नहीं करता। वह तो यह अनुभव करता है कि वह दिन कभी आएगा ही नहीं जब उसे फांसी पर लटकाया जाएगा या फिर वह यह अनुभव करता है कि भारतीय भीड़ कभी भी मननशील भीड़ नहीं बन पाएगी। पर निश्चय ही भारतीय भीड़ का यह अंश मननशील है। इसे अस्पृश्यों के उन प्रतिनिधियों ने दर्शा दिया है जो काले झंडे लेकर श्री गांधी का विरोध करने के लिए 28 तारीख को एकत्र हुए।

अस्पृशों ने श्री गांधी का विरोध क्यों किया? इस प्रश्न का उत्तर उस वक्तव्य में मिल जाएगा, जिसे इन प्रदर्शनों के आयोजकों ने जारी किया था। उसे मुद्रित रूप में उसी दिन प्रसारित किया गया था। प्रस्तुत हैं उसके उद्धरणः

गांधीजी और कांग्रेस के विरुद्ध हमारा आरोप-पत्र

कोरे आशीर्वाद और कोरी सहानुभूति का नाटक बंद करो

हमें न्याय दो, हमारे साथ ईमानदारी बरतो

  1. इस तथ्य के बावजूद कि अस्पृश्यता-निवारण को कांग्रेस के रचनात्मक कार्यक्रम में शामिल कर लिया गया है, इस संस्था ने उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अभी तक लगभग कुछ भी नहीं किया है। महाड और नासिक में अस्पृश्यता के विरुद्ध हमारे संघर्षों में अधिकांश स्थानीय कांग्रेसी नेता हमारे कट्टर विरोधी रहे हैं।

  2. दलित वर्गों के विश्वासपात्र और मान्यता प्राप्त नेता डॉ. अम्बेडकर ने उनकी मांगों को लंदन के गोलमेज सम्मेलन में जिस रूप में प्रस्तत किया था, उनके बारे में गांधीजी का रवैया अति अनुचित, कठोर और अस्पष्ट था।

  3. गांधीजी कांग्रेस की ओर से इस बात के लिए तैयार थे कि मुसलमानों ओर सिखों के विशेष दावे मान लिए जाएं, जिनमें ‘एतिहासिक आधारों’ पर पृथक प्रतिनिधित्व की माग भी शामिल थी, लेकिन वह दलित वर्गों को सामान्य निर्वाचन-क्षेत्रों में आरक्षित सीटें देने के लिए भी तैयार नहीं थे, जब कि वह जानते थे या उन्हें जानना चाहिए था कि यदि उन्हें स्वर्ण हिंदुओं की दया पर छोड़ दिया गया, तो उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा।

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