सभ्यता या घोर असभ्यता
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दूसरा दृष्टिकोण अपनाना होगा। उन्हें केवल धार्मिक दृष्टिकोण अपनाना छोड़ देना चाहिए। उन्हें भारत के लोगों के प्रति सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टिकोण भी अपनाना होगा। इसका अर्थ नहीं कि हमें यह जानने का प्रयास नहीं करना चाहिए कि धर्म ने भारत के लोगों के आर्थिक और सामाजिक जीवन को किस प्रकार प्रभावित किया है। यदि धर्म को ध्यान में न रखा जाए तो वास्तव में भारत के लोगों का कोई भी अध्ययन, चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान, उनके जीवन का पर्याप्त चित्रण नहीं कर सकता। इसका कारण है। भारत में धर्म उसी प्रकार सर्वोपरि है, जिस प्रकार यूरोप में मध्य-युग में रोमन कैथोलिक चर्च था। ब्राइस ख्1, ने लोगों के जीवन पर चर्च के प्रभुत्व का जिन शब्दों में वर्णन किया है, वह यहा उल्लेखनीय है, ‘चर्च का जीवन, चर्च के लिए जीवन, चर्च के माध्यम से जीवन, वह जीवन जिसे चर्च प्रातःकालीन सामूहिक प्रार्थना सभा में आशीर्वाद और सांध्यकालीन प्रार्थना सभा में शांति प्रदान करता है, वह जीवन जिसे चर्च निरंतर होने वाले धार्मिक संस्कारों से पुष्ट करता रहता है, पाप की स्वीकारोक्ति से राहत प्रदान करता है, तप से उसे शुद्ध करता है, चिंतन और उपासना के लिए मूर्त प्रतीक प्रस्तुत कर उसे चेतावनी देता रहता है, यह था वह जीवन जिसे मध्य-युग के अनगिनत लोगों ने मानव का धर्मपरायण जीवन समझा था, अनेक लोगों का यही वास्तविक जीवन था, उनका सर्वमान्य आदर्श था।
आज भारत के लोगों के जीवन पर धर्म जिस प्रकार हावी है, वह स्थिति चर्च की उस स्थिति से लेशमात्र भी भिन्न नहीं है, जो मध्य-युग में उसकी लोगों के जीवन में थी। अतः धर्म को ध्यान में न रखना भूल होगी। लेकिन यह सोचना भी उतना ही ठीक है कि धार्मिक दृष्टिकोण कोरा सतही चित्र प्रस्तुत करेगा। अतः यह जानना अधिक महत्वपूर्ण है कि सामान्य जनता और उसके विभिन्न वर्ग के लोग भारत में किस प्रकार का जीवन यापन करते हैं? उनके सामूहिक जीवन की सामाजिक अनिवार्यताएं और आर्थिक जरूरतें क्या हैं? कहां तक वे धर्म से प्रभावित हैं। हिंदू समाज के दायरे में आने वाले विभिन्न वर्ग के लोग जिस प्रकार का सामाजिक जीवन जीते हैं, उसमें इस प्रश्न का उत्तर हमें मिल जाता है।
II
यह खेद की बात है कि प्रो. मैक्स मूलर कभी भारत नहीं आए। सिद्धांत और यथार्थ में कितना अंतर होता है, इसे देखने के बाद वह संभवतः अंतर को स्पष्ट कर सकते थे। फिलहाल यह अंतर एक पहेली बना हुआ है।
यह अंतर उस ब्रह्म सिद्धांत के बावजूद है, जिसकी दुहाई देते हुए ब्राह्मण यह कहते
- होली रोमन एम्पायर, पृ. 367