196 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कांग्रेस भारतवासियों से आग्रह करती है कि यह आवश्यक, न्यायोचित और
न्यायसंगत है कि दलित वर्गों पर रीति-रिवाज द्वारा थोपी गई सभी असुविधाओं
को दूर किया जाए। असुविधाएं अति जघन्य और दमनकारी प्रकार की हैं और
उनसे इन वर्गों को भारी कठिनाई और असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। ख्1,
कांग्रेस की बागडोर श्री गांधी के हाथों में 1920 में आ गई और कांग्रेस ने नागपुर में अपने सामान्य सत्र में निम्न संकल्प पारित कियाः
अंतर-सांप्रदायिक एकता
अंततः इस उद्देश्य से कि एक वर्ष के भीतर खिलाफत और पंजाब की
गलतियां ठीक की जा सकें और स्वराज की स्थापना हो सके, यह कांग्रेस सभी
सार्वजनिक संस्थाओं से, चाहे वे कांग्रेस से जुडी हों या नहीं, आग्रह करती है
कि वे पूर्णतः इस बात की ओर ध्यान दें कि अहिंसा और सरकार से असहयोग
की भावना फले-फूले और चूंकि असहयोग आंदोलन तभी सफल हो सकता है,
जब स्वयं जनता के बीच पूर्ण सहयोग हो, अतः यह कांग्रेस सार्वजनिक संस्थाओं
से हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने की अपील करती है और इस कांग्रेस
के हिंदू प्रतिनिधि गणमान्य हिंदुओं से आग्रह करते हैं कि जहां भी ब्राह्मणों
तथा गैर-ब्राह्मणों के बीच विवाद हों, उन सबको वे निपटा लें और हिंदू धर्म
को अस्पृश्यता के कलंक से छुटकारा दिलाने के लिए विशेष प्रयास करें और
यह कांग्रेस धर्माध्यक्षों से अनुरोध करती है कि दलित वर्गों के प्रति व्यवहार के
मामले में हिंदू धर्म में सुधार किए जाने की पनपती हुई इच्छा को पूर्ण करने में
वे अपना सहयोग प्रदान करें।
पुनः क्या श्री गांधी ने स्वराज प्राप्ति के लिए अस्पृश्यता-निवारण की शर्त नहीं रखी? 29 दिसंबर, 1920 के ‘यंग इंडिया’ में श्री गांधी ने लिखा थाः
सरकार से असहयोग का अर्थ है शोसितों के बीच सहयोग और यदि हिंदू
अस्पृश्यता के कलंक को नहीं मिटाते तो एक वर्ष में तो क्या, सौ वर्षों में भी
स्वराज प्राप्त नहीं होगा।...
23 फरवरी, 1921 के ‘यंग इंडिया’ के अंक में स्वराज की शर्तों के बारे में लिखते हुए उन्होंने कहा थाः
अगले अक्तूबर तक स्वराज पा लेना कोई कठिन काम नहीं होगा, यदि कुछ
- लेखक की कृति ‘व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू दि अनटचेबिल्स’ के पृ. 1 से यह उद्धरण लिया
गया है। मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में यह टंकित नहीं है µ संपादक।