10. श्री गांधी की छत्राछाया में - Page 212

श्री गांधी की छत्रछाया में

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मामूली शर्तें पूरी की जा सकें। मैंने गत सितंबर में एक वर्ष की अवधि का उल्लेख

करने का साहस किया था, क्योंकि मैं जानता था कि शर्तें बहुत मामूली हैं और

मुझे लगा था कि देश का वातावरण अनुकूल है। पिछले पांच महीनों के अनुभव

ने मेरी राय को और पक्का कर दिया है। मुझे पूरा विश्वास है कि स्वराज की

स्थापना के लिए देश आज जितन आतुर है, उतना पहले कभी नहीं था।

लेकिन हमारे लिए यथासंभव सही रूप में शर्तों को जान लेना जरूरी है।

एक सर्वोपरि अनिवार्य शर्त है, अहिंसा के क्रम को जारी रखना।....

दूसरी शर्त है .... हर ग्राम मे कांग्रेस एजेंसी की स्थापना।

कुछ बातें सभी पर लागू होनी चाहिएं। सर्वाधिक प्रभावी बात है, स्वदेशी।

हर घर में चर्खा होना ही चाहिए और हर ग्राम ... आयोजन कर सकता है और

आत्मनिर्भर हो सकता है।

तिलक स्वराज फंड में हर पुरुष और स्त्री कुछ धन दे सकते हैं, भले ही

वह एक पैसा हो। आंदोलन के लिए धन जुटाने के बारे में हमें कोई चिंता नहीं

करनी चाहिए।

हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना और अस्पृश्यता के सर्प को मारे बिना हम

कुछ नहीं कर सकते।....

क्या इस मामूली से कार्य के लिए हमारे पास ईमानदार, सच्चे, परिश्रमी और

देशप्रेमी कार्यकर्ता हैं। यदि हैं, तो अगले अक्तूबर से पूर्व ही भारत में स्वराज

की स्थापना हो जाएगी?

अस्पृश्यों को और क्या चाहिए था? उनके पास श्री गांधी हैं, जिन्होंने स्वयं को अस्पृश्यों का मित्र घोषित किया है। उनका सेवक कहलाकर वह गर्व अनुभव करते हैं। उन्होंने दावा किया है, उन्होंने संघर्ष किया है कि उन्हें अस्पृश्यों का प्रतिनिधि माना जाए। श्री गांधी के प्रति अस्पृश्य ऐसा अविश्वास क्यों प्रकट करें?

कथनी के आधार पर आरोप निराधार दीख पड़ता है। लेकिन क्या यह आधार तब भी उतना ही निराधार दीख पड़ेगा, जब हम करनी की ओर ध्यान दें? प्रस्तुत है, श्री गांधी की करनी का मंथन।

श्री गांधी और उनके मित्रों ने अस्पृश्यों के लिए जो कार्य करने का दावा किया है, वह दो अवधियों का है। एक अवधि पूना समझौते से पूर्व की है और दूसरी पूना समझौते के बाद की। प्रथम अवधि को बारदोली कार्यक्रम वाली अवधि कहा जा सकता है। दूसरी अवधि को हरिजन सेवक संघ की अवधि कहा जा सकता है।