श्री गांधी की छत्रछाया में
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महासचिव से अनुरोध किया जाए कि वह स्वामी श्रद्धानंद से अनुरोध करें
कि वह अपने त्यागपत्र पर पुनर्विचार करें और उसे वापस ले लें, और दलित
वर्ग उप-समिति के आकस्मिक व्यय के लिए संयोजक श्री जी.बी. देशपांडे के
पास पांच सौ रुपये की राशि भेज दी जाए।
इस प्रकार 1922 का वर्ष भी बीत गया, बारदोली कार्यक्रम की उस मद को कार्यरूप देने के लिए कुछ भी नहीं किया गया, जिसका संबंध दलित वर्ग से था। फिर 1923 का वर्ष आ गया। जनवरी 1923 में कार्यकारिणी की बैठक गया में हुई और उसमें निम्न संकल्प पारित किया गयाः
स्वामी श्रद्धानंद के त्यागपत्र के संदर्भ में सकल्प किया गया कि दलित
वर्ग उप-समिति के शेष सदस्य कमेटी का गठन करें और श्री याज्ञनिक उसके
संयोजक हों।
फरवरी 1923 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक बंबई में हुई और यह देखकर कि तब तक कुछ भी नहीं किया गया, उसमें निम्न संकल्प दर्ज किया गयाः
संकल्प किया गया कि अस्पृश्यों की स्थिति का मसला आवश्यक कार्यवाही
हेतु कार्यकारिणी के पास भेज दिया जाए।
तब कार्यकारिणी ने क्या किया? 17 अप्रैल, 1923 को उसकी बैठक पूना में हुई और उसमें निम्न संकल्प किया गयाः
संकल्प किया गया कि जहां कांग्रेस की नीति के फलस्वरूप तथाकथित
अस्पृश्यों के प्रति व्यवहार में कुछ सुधार हुआ है, वहां यह कमेटी इस बारे में
सजग है कि इस संबंध में अभी बहुत कुछ करना बाकी है, और चूंकि अस्पृश्यता
के इस मसले का संबंध विशेषतः हिंदू समाज से है, अतः अखिल भारतीय हिंदू
महासभा से अनुरोध किया जाता है कि वह इस मसले को अपने हाथ में ले और
हिंदू समाज में से इस अभिशाप को मिटाने के लिए जोरदार प्रयास करे।
इस प्रकार उस रचनात्मक कार्यक्रम का अंत हुआ, जिसका बीड़ा अस्पृश्यों के लिए श्री गांधी और कांग्रेस ने उठाया था। किसी भी दृष्टि से अस्पृश्यों के लिए बारदोली कार्यक्रम क्रांतिकारी कार्यक्रम नहीं था। उसमें अस्पृश्यता को मिटाने का प्रयास तो किया गया पर उसमें जाति के बंधन को तोड़ने का प्रयास नहीं किया गया। उसमें अंतर्जातीय विवाह और सहभोज का कोई उल्लेख नहीं किया गया। उसमें अस्पृश्यों के लिए अलग कुओं तथा अलग स्कूलों के सिद्धांत को स्वीकार किया गया। वह केवल सुधार-कार्यक्रम था। फिर भी ऐसे निरापद कार्यक्रम को भी कांग्रेस पूरा नहीं कर सकी।
यह भी याद रखना होगा कि यह वह समय था, जब कांग्रेस संग्राम-पथ पर चल