10. श्री गांधी की छत्राछाया में - Page 217

202 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पड़ी थी। उसने ब्रिटिश साम्राज्य से संघर्ष करने की ठान ली थी और वह हर समुदाय को अपनी ओर आकर्षित करने तथा सबको अंग्रेजों से विमुख करने के लिए अति आतुर थी। यह वह समय था, जब कांग्रेस से अपेक्षा की जा सकती थी कि वह अस्पृश्यों को जताए कि कांग्रेस उनकी पक्षधर है और वह उनका हितसाधन मुसलमानों की भांति ही करने के लिए तैयार है। इससे बढ़कर शुभ घड़ी और हो ही नहीं सकती थी। इस घड़ी में हिंदू-जन अस्पृश्यों के प्रति अपने वैमनस्य को दूर करके उनका हितसाधान कर सकते थे। लेकिन ऐसी शुभ घड़ी भी हिंदुओं को इतना भी तरंगित नहीं कर सकी कि वे अस्पृश्यों के हित में यह नगण्य कार्य भी कर सकते। अस्पृश्यों के प्रति हिंदुओं की समाज-विरोधी भावनाएं कितनी कठोर रही होंगी। परमानंद और महानतम प्रेरणा, यानी स्वराज प्राप्ति की आशा भी उनकी कठोरता को द्रवित नहीं कर सकी। कांग्रेस अपने कार्यक्रम को कार्यरूप नहीं दे सकी। वह शर्मनाक ढंग से विफल रही, और वह एक दुखद घटना तो थी ही। उस अग्नि में घी का काम उस रीति ने किया, जिस रीति से उस मामले को निपटाया गया।

अस्पृश्यों के सुधार-कार्य को इससे अधिक गंदे हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता था। यदि कोई संस्था अस्पृश्यों के मसले को निपटने में नितांत आयोग्य है तो वह है, हिंदू महासभा। वह एक लड़ाकू हिंदू संगठन है। उसका लक्ष्य और प्रयोजन हर हालत में उस हर चीज का संरक्षण करना है, जो हिंदू धर्म और संस्कृति का अंग है। वह समाज सुधारक संगठन नहीं है। वह पूर्ण रूप से एक राजनीति संगठन है, जिसका मुख्य उद्देश्य और लक्ष्य भारतीय राजनीति से मुस्लिमों के प्रभाव को मिटाना है। केवल अपनी राजनीतिक शक्ति को बनाए रखने के लिए वह अपनी सामाजिक एकजुटता को कायम रखना है। सामाजिक एकजुटता को बनाए रखने का उसका तरीका यह नहीं कि वह जाति अथवा अस्पृश्यता के बारे में बात करे। मेरी समझ में नहीं आता कि अस्पृश्यों के कार्य को चलाने के लिए कांग्रेस ने क्या सोचकर ऐसे संगठन को चुना। इससे पता चलता है कि कांग्रेस जैसे-तैसे एक विकट समस्या से अपना पिंड छुड़ाना चाहती थी। निश्चय ही हिंदू महासभा स्वयं तो इस कार्य के लिए आगे नहीं आई थी। कांग्रेस ने तो केवल एक पावन संकल्प पारित करके सिफारिश कर दी कि यह काम महासभा को सौंप दिया जाए, पर वित्तीय व्यवस्था के लिए कोई वचन नहीं दिया गया। अतः कार्य योजना शर्मनाक और अपयशकारी ढंग से ठप्प हो गई। फिर भी ऐसे हजारों कांग्रेसी होंगे, जिन्हें यह डींग हांकते हुए शर्म नहीं आएगी कि कांगे्रस तो अस्पृश्यों के हित और ध्येय के लिए संघर्ष कर रही है। इससे भी घटिया बात यह है कि ऐसे सैंकड़ों विदेशी होंगे, जो चार्ल्स एफ. एंड्रयूज जैसे लोगों द्वारा किए गए झूठे प्रचार के प्रभाव में आकर ऐसा विश्वास करने के लिए तैयार हैं। एंड्रयूज महोदय श्री गांधी के मित्र हैं और उनका विचार है कि पश्चिमी जगत में गांधी का