श्री गांधी की छत्रछाया में
प्रचार-प्रसार करना उनके जीवन का असली मिशन है। ख्1,
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इतनी जानकारी काफी नहीं होगी कि प्रयास विफल हो गया और उसे बंद करना पड़ा। यह जानना जरूरी है कि स्वामी श्रद्धानंद ने इस्तीफा क्यों दिया और प्रस्तावित कमेटी में काम करने से इंकार क्यों कर दिया। उसके लिए कोई तो उचित कारण रहा ही होगा। कारण था। स्वामीजी अति जागरूक एवं प्रबुद्ध आर्यसमाजी थे और सच्चे दिल से अस्पृश्यता को मिटाना चाहते थे। इस मुद्दे केबारे में स्वामीजी और अखिल भारतीय कांगे्रस कमेट के महासचिव के बीच जो पत्र-व्यवहार हुआ, वह कांग्रसियों की मनोवृत्ति पर पर्याप्त प्रकाश डालता है। नीचे पूरे पत्र-व्यवहार को उद्धृत करने में मुझे कोई ग्लानि नहीं होगी।
स्वामीजी का पत्र
महासचिव
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी
कैम्प, दिल्ली।
आपके पत्र संख्या 331 और 332 प्राप्त हुए। तदर्थ धन्यवाद। उनमें अस्पृश्यता के बारे में कार्यकारणी और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के संकल्प हैं। लेकिन
खेद है कि कांग्रेस कमेटी का संकल्प जिस रूप में इस समय मुझे मिला है, उसमें पूर्णतः उस सबका समावेश उस रूप में नहीं हैं, जिस रूप में कमेटी ने उसे पास किया था।
तथ्य यह हैं। मैंने 23 मार्च, 1922 को तत्कालीन श्री विट्ठलभाई पटेल के पास निम्न पत्र भेजा था और उसे देश के प्रमुख दैनिक समाचार-पत्रों में प्रकाशित किया गया था।
प्रिय श्री पटेल, एक समय था (देखिए 25 मई, 1921 का ‘यंग इंडिया’)
जब महात्माजी ने अस्पृश्यता के मसले को कांग्रेस के कार्यक्रम में अग्रणी स्थान
दिया था। पर अब मैं देखता हूं कि दलित वर्गों के उत्थान के मसले को एक
अंधेरे कोने में फेंक दिया गया है। जहां खादी की ओर हमारे श्रेष्ठ कार्यकर्ता
ध्यान दे रहे हैं और इस वर्ष के लिए उसके वास्ते पर्याप्त धनराशि की अलग
से व्यवस्था की गई है, जहां राष्ट्रीय शिक्षा की देखभाल के लिए एक सशक्त
उप-समिति का गठन किया गया है और उसके लिए धन की विशेष अपील की
जाएगी, वहां अस्पृश्यता-निवारण के मसले को ताक पर रख दिया गया है। उसके
लिए अहमदनगर, और मद्रास के केवल मामूली से अनुदान दिए गए हैं।
- श्री एंड्रयूज ने तो एक बार वर्ण-व्यवस्था का भी समर्थन कर दिया।