8 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हैं कि ब्रह्म सभी प्राणियों में व्याप्त है और सभी प्राणियों में उसका वास है। यदि ब्राह्मण में ब्रह्म का वास है तो वह आदिवासी, जरायम-पेशा और अस्पृश्य में भी तो हैं? इन दो तथ्यों में, अर्थात् ब्रह्म सिद्धांत और उसके विपरीत आदिम जातियों, जरायम-पेशा जातियों और अस्पृश्य जातियों के अस्तित्व में किस प्रकार हो सकता है?
इस दलित वर्ग की तीन अलग-अलग कोटियां हैं। एक कोटि उन लोगों की है, जिन्हें आदिम जातियां कहते हैं। दूसरी कोटि जरायम-पेशा वर्गों की सूची में शामिल जातियों की है। एक अलग तथा तीसरी श्रेणी उन लोगों की है, जिसे अस्पृश्य वर्ग कहते हैं।
इन तीनों कोटियों के लोगों की संख्या कुद कम नहीं है। 1931 की जनगणना के अनुसार भारत में आदिम जातियों के लोगों की कुल संख्या दो करोड़ 50 लाख है। अब जरायम-पेशा के रूप में सूचीबद्ध जरायम-पेशा वर्गों की कुला संख्या कोई 45 लाख है। 1931 की जनगणना के अनुसार अस्पृश्यों की कुल संख्या समग्र भारत में पांच करोड़ है। कुल मिलाकर इन लोगों की संख्या सात करोड़ 95 लाख है। अब प्रश्न यह है कि इन सात करोड़ 95 लाख लोगों की स्थिति क्या है?
पहले आदिम जातियों को लें। उनकी सभ्यता किस अवस्था में है?
उन्हें जो यह आदिम जाति नाम दिया गया है, उससे ही उनकी वर्तमान दशा का पता चल जाता है। वे वनों में यत्र-तत्र छोटी-छोटी झोंपडि़यों में रहते हैं। वे जंगली फल, कंद व मूल खाते हैं । भोजन के लिए वे मछली और वन्य जंतुओं का शिकार भी करते हैं। उनकी सामाजिक अर्थव्यवस्था में खेती का नगण्य स्थान है। खाद्य सामग्री का वहां नितांत अभाव है। अतः उन्हें भरपेट भोजन नसीब नहीं होता। यह उनकी नियति है । वे लगभग पूर्ण नग्न अवस्था में रहते हैं। बोंडा पोराज नामक एक आदिम जाती है। बोंडा पोराज का अर्थ ही है ‘नग्न पोराज’। इन लोगों के बारे में कहा जाता है कि इनकी महिलाएं एक टुकड़ा लपेटे रहती हैं, जो पेटीकोट का काम करता है। वह वैसा ही होता है, जैसा कि असम के मोमजाक नागा लोग पहनते हैं। उसके सिरे बाईं जंघा के ऊपर बड़ी मुश्किल से बंधा पाते हैं। ये पेटीकोट जंगली पेड़ की छाल के रेशे से घर पर ही बुने जाते हैं। लड़कियां अपने बगलों में ताड़ के पंख और मनके लगाकर चोटियां गूंधती हैं। वे अपने गले में ढेर सारे मनके की मालाएं और अन्य आभूषण ठीक उसी प्रकार धारण करती हैं, जिस प्रकार कि अनेक मोमजाक महिलाएं धारण करती हैं। इसके अलावा महिलाएं कुछ भी नहीं पहनती। महिलाएं अपने सिर को पूरी तरह मुंडवाती हैं। ...निजाम के राज्य में फरहाबाद के पास रहने वाली चेंचु नामक एक जाति के बारे में कहा जाता है कि उनके घर शंकु के आकार के छोटे-छोटे होते