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श्री गांधी की छत्रछाया में

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पास तो बहुत थोड़ी-सी नकद राशि है। अतः यदि सही स्थिति बताए जाने का आग्रह किया गया तो इससे आंदोलन पर आंच आएगी, क्योंकि बाहर के लोग और खुफिया विभाग के लोग भी यहां मौजूद हैं। इस पर मैंने श्री राजगोपालाचारी के संशोधन को स्वीकार कर लिया, भले ही मेरे प्रस्ताव के अनुमोदनकर्ता और समर्थकों ने उसका विरोध किया। लेकिन मेरे आश्चर्य की सीमा न रही, जब मैंने ‘एसोसिएटेड प्रेस’ द्वारा प्रकाशित रूप में अपने संकल्प को दैनिक समाचार-पत्रों में देखा। उसमें श्री राजगोपालाचारी के संशोधन का तो कहीं नामोनिशान न था।

संशोधन पारित हो जाने के बाद कुछ सदस्यों ने सुझाव दिया कि उप-समिति के संयोजक की नियुक्ति की जाए। कई सदस्यों ने संयोजक के रूप में मेरे नाम का प्रस्ताव रखा। इस पर श्री विट्ठलभाई पटेल (तत्कालीन महासचिव) ने खड़े होकर कहाः ‘चूंकि सर्वप्रथम स्वामी श्रद्धानंद के नाम का प्रस्ताव किया गया है, अतः स्वाभाविक है कि वही संयोजक होंगे। अतः किसी नए संकल्प को प्रस्तुत करने की कोई जरूरत ही नहीं है।’

देश के सभी भागों से आने वाले सदस्य-अपने-अपने प्रांतों में अस्पृश्यता के बारे में मुझे सूचना देने लगे और मुझसे वहां आने का आग्रह करने लगे। इस पर मैंने कुछ वचन दिए। फिर मैंने सोचा कि जब तक प्रारंभिक व्यय के लिए कोई नकद राशि हाथ में न हो, तब तक मौके पर जाकर कोई पड़ताल संभव नहीं होगी और कोई समुचित योजना भी नहीं बनाई जा सकेगी। मुझे यह भी पता चला कि इलाहाबाद के ‘दि इंडिपेंडेंट’ के लिए कार्यकारिणी ने पच्चीस हजार रुपये की स्वीकृति दे दी है और हकीम अजमल खान और डॉ. अंसारी ने कार्यकारिणी के सामने यह अर्जी पेश की है कि दिल्ली के उर्दू दैनिक ‘दि कांग्रेस’ को दस हजार रुपये का अनुदान दिया जाए। अतः यह सोचकर कि बहरहाल कांग्रेस के पास नकद राशि का अधिक अभाव नहीं होगी, मैंने अध्यक्ष के नाम एक पत्र लिखा और अनुरोध किया कि वह प्रारंभिक व्यय के लिए दस हजार रुपये की अग्रिम राशि अस्पृश्यता उप-समिति को दे दें।

बहरहाल आपने पत्र संख्या 331 के जरिए कार्यकारिणी का जो निम्न संकल्प भेजा है, वह बड़ा दिलचस्प हैः

दलित वर्ग संबंधी कार्य-योजना तैयार करने के लिए अग्रिम राशि के बारे में दिनांक

8 जून, 1922 का स्वामी श्रद्धानंद का पत्र पढ़ा गया। संकल्प किया गया कि इस

प्रयोजन के लिए गठित उप-समिति के संयोजक के रूप में श्री जी.बी. देशपांडे को

नियुक्त किया जाए और उनसे अनुरोध किया जाए कि वह शीघ्र ही किसी तिथि

पर बैठक बुलाएं और स्वामी श्रद्धानंद का पत्र उप-समिति को भेज दें।