10. श्री गांधी की छत्राछाया में - Page 222

श्री गांधी की छत्रछाया में

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चाहता हूं कि इस मद का भारी महत्व है। मुझे ऐसे मामलों की जानकारी है, जहां तथाकथित उच्च जातियों के अत्याचार के विरोध में दलित वगों ने खुला विद्रोह किया है और यदि उनकी उपरोक्त मांगे पूरी न की गईं तो वे नौकरशाही की साजिशों के शिकार हो जाएंगे।’ लखनऊ में 7 जून को जब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में मेरे प्रथम प्रस्ताव पारित कर दिए गए, तो उसके बाद मैंने श्री पटेल से अनुरोध किया कि वह बैठक के सामने बारदोली संकल्प की मद संख्या (4) के टिप्पण पर मेरे प्रस्तावित संशोधन को प्रस्तुत करें। उन्होंने मुझे बताया कि कार्यकारिणी उसे उप-समिति के पास भेजेगी और मुझसे बैठक में उस पर आग्रह न करने का अनुरोध किया। मैं समहत हो गया। लेकिन मुझे कार्यकारिणी के ऐसे किसी संकल्प की प्रति नहीं मिली है, जिसके द्वारा मेरा प्रस्ताव अस्पृश्यता उप-समिति के पास भेजा गया हो।

दिल्ली में और उसके आस-पास अस्पृश्यता का मसला अति विकट है और मुझे तुरंत संघर्ष करना है। लेकिन उप-समिति बिना किसी तैयारी के तुरंत कार्य शुरू नहीं कर सकती, क्योंकि कांग्रेस की ओर से अस्पृश्यता-निवारण हेतु अपनाए जाने वाले व्यावहारिक उपायों की किसी योजना पर फैसला करने पूर्व कार्यकारिणी को देश की अन्य अनेक राजनीतिक स्थितियों को ध्यान में रखना होगा। इन राजनीतिक परिस्थितियों में मैं उप-समिति के लिए तनिक भी उपयोगी सिद्ध नहीं हो सका। अतः मैं सदस्यता को त्यागना चाहता हूं।

भवदीय,

श्रद्धानंद संन्यासी

दिल्ली, 30 जनवरी

सचिव का उत्तर

प्रिय स्वामीजी,

मुझे आपका जून 1922 का जो पत्र 30 जून को मेरे कार्यालय में प्राप्त हुआ है, उसे 18 जून को बंबई में पारित कार्यकारिणी के संकल्प के अनुसार मेरे पास इस अनुदेश के साथ भेजा गया है कि मैं तथ्यों को स्पष्ट करुं और आपसे अनुरोध करुं कि आप कृपा करके दलित वर्ग संबंधी उप-समिति से दिए गए अपने त्यागपत्र पर पुनर्विचार करें।

जैसा कि आपको विदित है, मुझे उन तथ्यों की कोई व्यक्तिगत जानकारी नहीं है, जो जेल से मेरी रिहाई से पूर्व घटित हुए। लेकिन मैं कार्यकारिणी की उस बैठक