श्री गांधी की छत्रछाया में
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‘नेशनेलिस्ट जर्नल्स’ लिमिटेड को पच्चीस हजार रुपये का ट्टण दे दिया जाए। जहां तक दूसरे पत्र का संबंध है, ट्टण संबंधी अर्जी बिल्कुल नामंजूर कर दी गई है।
भवदीय,
मोतीलाल नेहरू
महासचिव
बंबई, 23 जुलाई, 1922
स्वामीजी का पुनरुत्तर
प्रिय पंडित मोतीलालजी,
अस्पृश्यता उप-समिति से मेरे त्यागपत्र के बारे में बंबई से भेजा गया 23 जुलाई, 1922 का आपका पत्र मुझे मिला। मुझे खेद है कि मैं उस पर पुनर्विचार करने में असमर्थ हूं, क्योंकि अपने प्रथम पत्र में मैंने जो कुछ तथ्य प्रस्तुत किए थे, उनकी सहज ही उपेक्षा कर दी गई है।
कृपया श्री राजगोपालाचारी से पूछें कि क्या सर्वप्रथम मैंने यह प्रस्ताव नहीं रखा था कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के पास जो धनराशि हो उसमें से कम-से-कम एक लाख रुपया नकद दिया जाए, क्या उन्होंने एक संशोधन प्रस्तुत करके उपरोक्त के स्थान पर ऐसे शब्द नहीं रखे थे, जिनका आशय यह वचन देना था कि जब उप-समिति द्वारा निर्धारित कार्य-योजना को कार्यकारिणी स्वीकार कर ले तो वह अस्पृश्यता निवारण विभाग को उतनी रकम आबंटित करेगी, जितनी की वह उस समय दे सके? क्या मैंने उनके संशोधन को स्वीकार नहीं कर लिया था, जब अध्यक्ष ने मुझे एक बारे ले जाकर उस समय की वास्तविक वित्तीय स्थिति समझा दी थी? यदि यह तथ्य है, तो संकल्प में संशोधन क्यों नहीं जोड़ा गया?
क्या आपने श्री विट्ठलभाई जे. पटेल से पूछा कि क्या अखिल भारतीय कमेटी के सदस्यों ने उप-समिति के संयोजक के रूप में मेरे नाम का प्रस्ताव नहीं रखा था और क्या उस समय उन्होंने यह नहीं कहा था µ चूंकि सर्वप्रथम स्वामी श्रद्धानंद कि नाम का प्रस्ताव किया गया है, अतः स्वाभाविक है कि वही संयोजक होंगे और इसलिए किसी नए संकल्प को प्रस्तुत करने की कोई जरूरत नहीं है। मैंने इसके बारे में डॉ. अंसारी से पूछा था। 17 जून, 1922 को उत्तर देते हुए उन्होंने लिखा था कि मुझे ही संयोजक