210 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
नियुक्त किया गया था। डॉ. अंसारी तो आपके साथ हैं और आप उनसे इसकी पुष्टि कर सकते हैं। मुझे आशा है कि इसके बारे में श्री पटेल भी पूरी तरह भूले नहीं होंगे।
- फिर अस्पृश्यों के बीच तात्कालिक कार्य तत्काल किया जाना है और मैं उसे किसी भी कारण टाल नहीं सकता। कृपया मेरे त्यागपत्र को कार्यकारिणी की अगली बैठक में मंजूर करा लें, ताकि मैं मुक्त होकर अस्पृश्यता के बारे में अपनी स्वतंत्र योजना तैयार कर सकूं। पिछली जुलाई के अंत तक मेरा यही दृष्टिकोण था। अमृतसर और मियांवाली जेलों में मेरा जो अनुभव रहा है और वहां जो सूचना मुझे मिली है, उसने मेरे इस विश्वास को और पुष्ट कर दिया है कि जब तक प्राचीन आर्य पद्धति के अनुसार ब्रह्मचर्य की पुनः प्रतिष्ठा नहीं होगी और भारतीय समाज से अस्पृश्यता के अभिशाप को नहीं मिटा दिया जाएगा, तब तक कांगेस का भी और उससे बाहर के अन्य देश-प्रेमी संगठनों का भी स्वराज प्राप्ति का हर प्रयास निष्फल रहेगा। और चूंकि स्वराज के बिना राष्ट्रीय आत्म-साक्षात्कार और ओजस्वी एवं तेजस्वी अस्तित्व संभव नहीं है, अतः संन्यासी के नाते मेरा कर्तव्य हो जाता है कि मैं इस पावन ध्येय के लिए ब्रह्मचर्य और सच्ची राष्ट्रीय अखंडता के ध्येय के लिए तन, मन, धन से अपना शेष जीवन अर्पित कर दूं।
भवदीय,
दिल्ली, 23 जुलाई, 1922 श्रद्धानंद संन्यासी
इससे पता चलता है कि अस्पृश्यों के उत्थान के पीछे कांग्रेसियों की क्या मनोवृत्ति थी।
II
यह तो थी कांग्रेस-जनों के स्वैच्छिक योगदान की कथा। कांग्रेस-जनों और श्री गांधी के उन अस्पृश्यों की कितनी मदद की, जो अपने लोगों के उत्थान के लिए स्वतंत्र रूप से कार्य कर रहे थे। यह वह समय था, जब अस्पृश्य स्वयं संघर्ष-पथ पर थे। वे भी अपने नागरिक तथा सामाजिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए हिंदुओं के खिलाफ सविनय अवज्ञा का प्रयोग करने लगे थे। यह वह समय था, जब बंबई प्रेसिडेंसी के अस्पृश्यों में महाड में सार्वजनिक तालाब से पानी लेने के लिए और नासिक में हिंदू मंदिर में प्रवेश के अपने अधिकार की स्थापना के लिए अपना सत्याग्रह छेड़ दिया था। सवर्ण हिंदुओं के खिलाफ अस्पृश्यों ने जो यह सत्याग्रह आंदालन छेड़ा था, उसके प्रति श्री गांधी का क्या दृष्टिकोण था? कम-से-कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि श्री गांधी का रवैया बहुत ही असंगत था।